Thursday, 6 February 2014

वास्तु सुधार में लिए जा रहे वास्तु के Products की वास्तविक्ता

श्रीमद् भगवत् गीता में एक श्लोक हैं-
            ऊध्र्वमूलमध: शाखमश्वत्थं प्राहुरत्ययम्।
          छंदासि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।
अर्थात:- कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष हैं जिसकी जडें तो ऊपर है और शाखाँए जीचे की ओर तथा ऊसकी पत्तियाँ वैदिक स्तोत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता हैं, वह वेदो का ज्ञाता हैं।
                        इसी क्रम में जो व्यक्ति वेदो का ज्ञाता हो उसे भूत, भविष्य और वर्तमान सभी का पता होता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर आदि युगो में ऋषियो की वाणि में सत्यता तप द्वारा ही आती थी। कलयुग के विषय में उन्हें पहले से ही पता था कि इस युग के विद्वानो की वाणि में उतनी क्षमता नही होगी। ना ही वे किसी का भूत, भविष्य आदि बता पाऐगें। अत: उन्होनें मानव कल्याण के लिए ज्योतिष वास्तु आदि कई अन्य विधियों, सूत्रो की रचना की, उन्होने सिर्फ मानव कल्याण को लक्ष्य मानकर ही इन विद्याओं को मुर्त रूप दिया। ऋषियों द्वारा वर्णित सूत्रो से प्रत्येक व्यक्ति का भूत वर्तमान व भविष्य में होने वाली घटनाओ का जाना जा सकता हैं। जिससे भविष्य में घटित होने वाली घटनाओ से बचा जा सकता हैं साथ ही वर्तमान को भी सुधारा जा सकता हैं।
            इसे हम यू समझ सकतें है, जैसे प्रत्येक व्यक्ति को देवता भाग्य के 100 अंक देकर भेजते हैं लेकिन ये अंक उसे एक साथ न देकर इधर-उधर बिखेर देते हैं व्यक्ति के पूर्व जन्मों के कर्मो के अनुसार। ज्योतिष केवल उन बिखरे हुए भाग्य के अंको को कैसे प्राप्त किया जाए उसका मार्ग ही बता सकता हैं।
            वर्तमान समय में ज्योतिष व वास्तु का प्रचलन तेजी से बढ रहा हैं साथ ही साथ ऐसे लोगो का जनसमूह भी बढ रहा हैं जो अपने को वास्तुशास्त्री व ज्योतिषी बतातें हैं चाहे उन्हें इस विद्या का ज्ञान न भी हो तो भी वे लोगो को सफलता प्राप्ति हेतु वास्तु के विभिन्न Products का उपयोग वास्तु दोष निवारण में करते हैं। जिसका वास्तु सुधार तो दूर वास्तू  से भी दूर-दूर तक कोई लेना देना नही होता हैं।

यहाँ हम कुछ वास्तु संबंधी Products की चर्चा करेगें कि वे वास्तु सुधार में कारगर है भी या नही -

1.         सीसा - किसी भी व्यक्ति का मकान यदि T Point बना हो तो वास्तु के हिसाब से यह अशुभ माना जाता हैं। यदि मकान का मुख्य द्वार ‘T’ पर हो तो अशुभता की मात्रा और भी बढ जाती हैं। ऐसे मकानो में आधुनिक वास्तुशास्त्री सीसे का प्रयोग सामने से आ रही सडक के समने लगाकर यह मान है कि घर में Negative उर्जा नही आएगी बल्कि उसका रुख वापस सडक पर हो गया हैं।

  किसी भूखण्ड का कोई कोणा कट रहा हो तो भी शीशे का प्रयोग इस प्रकार किया जाता हैं कि भूखण्ड के अन्दर से शीशे में देखने पर अपनी Boundry Wall का प्रतिबिम्ब दिखाई देता हैं। ऐसा करके ये कहते है कि कटान खत्म हो गया या कहेगें कि बढ गया हैं।
            यह धारणा बिलकुल निरर्थक हैं, शीशे का आविष्कार 6000 ईसा वर्ष पूर्व हुआ जबकि हमारे वेद, पुराण, ग्रंथ इससे काफी पुराने है, उस समय जब सीसे नही हुआ करते थे। इसे यु समझे एक बार बचपर में भगवान श्रीराम जी ने माता से चाँद को छुने की जिद् की तो माता कोशल्या ने पानी में चाँद को दिखाया न कि सीसे में। तो सीसा वास्तु दोष निवारण में किस प्रकार सक्ष्म हुआ।
            यह हमें खुद ही समझना होगा। यदि शीशे से ही भूखण्ड का आकार घटाया या बढाया जा सकता तो आज गरीब से गरीब व्यक्ति के पास स्वयं का भुखण्ड होता।

A-1
2.         Copper Wire- आज कल Copper Wire प्रयोग भी काफी प्रचलन में है, दिये गए चित्र संख्या ‘A-1’ में जिसका वायव्य कोना बढा हुआ हैं असे ठीक करने के लिए Copper Wire का प्रयोग करते है। चित्र संख्या ‘A-2’ के अनुसार Copper Wire को भूमि के अन्दर दबाकर कहते है कि अब आपका भूखण्ड का दोष समाप्त हो गया हैं। आपका भुखण्ड के अब दो भागो में विभजित हो गया हैं चित्र ‘A-3’ अनुसार। पहला भाग ‘क’ जो दोष रहित हैं दूसरा
A-2
                                                   
‘ख’ भाग जो दोषपूर्ण है उसे अलग कर दिया हैं। स विधि से आपका  वास्तु दोष सम्पन्न हुआ। जबकि निर्माण कार्य सम्पूर्ण भूखण्ड पर करवाया जाता हैं। दोषपूर्ण हिस्से में शोचालय, गेरेज या गायो हेतु प्रयोग में लिया जाता हैं। ऐसा प्रयोग वास्तु सम्मत नही होता हैं। ऐसे उपायो से वास्तुशास्त्री की तो चॉदी होती हैं परन्तु शुभफल की प्राप्ति भू-स्वामी को कभी भी प्राप्त नही हो पाती हैं।



2.         पाईप का प्रयोग - एक बार मै जयपुर में स्थित सरनाडूंगर औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री के वास्तु संबंधी जाँच के लिए गया। फैक्ट्री फर्नीचर व्यवसाय से संबंधित थी। जिसमें पहले दो साझेदार हुआ करते थे। एक या दो वर्ष बाद दोनो अलग हो गए। पहला साझेदार नारायण व दूसरा हर्षित था। अलग होकर हर्षित ने पास में ही नयी फैक्ट्री
किराये पर लेकर वही व्यापार आरंभ कर दिया। नारायण उसी फैक्ट्री में बना रहा। अगले 4-5 वर्षो में नारायण को काफी घटा हुआ, जिसके परिणामस्वरुप उसे फैक्ट्री छोडनी पडी जो उसने किराये।
           हर्षित का कार्य जोरो पर था, उसने वह फैक्ट्री जो नारायण के पास थी उसे भी किराये पर ले लिया। हर्षित का दुर्भाग्य भी इसी के साथ शुरू हो गया। जब मै वहॉ पहुँचा तो मैने देखा की भूखण्ड के मध्य भाग से उत्तर दिशा में ही सारा निर्माण कार्य हो रखा हैं तथा दक्षिण दिशा निमार्ण रहित हैं। फैक्ट्री का मुख्य द्वार भी दक्षिण-पूर्व के कोने में स्थित हैं। भूखण्ड के मध्य भाग्य का दोष जहा वशं वृद्धि को बाधित करता हैं। यहाँ फैक्ट्री के विस्तार अर्थात वृद्धि को बाधित कर रहा हैं, वही उत्तर दिशा में स्थित भारी निर्माण गरीबी लाता हैं। दक्षिण-पूर्व का मुख्य द्वार भी अनावश्यक घटनाओ को बढाता हैं।
            मैनें कहा कि इस भूखण्ड में एक बार निर्माण कार्य पूर्ण हो जाने के बाद नवीन निमार्ण हेतू एक भी ईंट नही रखी गई होगी। इस बात की पुष्टि हर्षित ने हामी भर कर दी। जब हम टहलते-टहलते पहली मंजिल पर पहुँचे तो मैने देखा कि स्टाफ के लिए शोचालय का निर्माण भी उत्तर दिशा पर स्थित दिवारर पर हो रखा हैं। मैरी बात को यह निर्माण ओर भी सिद्ध करता हैं।
            उत्तर दिशा के स्वामी देवता कुबेर व लक्ष्मी जी हैं। कुबेर व लक्ष्मी जी धन-धान्य से संबंधित देवी देवता हैं। अत: उत्तर दिशा मे निर्मित शोचालय घर की सम्पन्नता को धीरे-धीरे कम करने लगता हैं। मैने हर्षित को अन्य वास्तु सम्मत समाधानो के बाद जब कहा कि आप भूखण्ड के दक्षिण दिशा जो निर्माण रहित हैं उसे निर्माण करवाकर भारी करें तो उन्होनें कहाँ कि आपसे पहले एक वास्तुशास्त्री आएं थे। उन्होनें दक्षिण दिशा को भारी करने के लिए भूखण्ड के दक्षिण-पश्चिम कोने में एक लोहे का पाईप झंडा लगाकर लगवाया हैं। मैने देखा सचमुच ऐसा हो रखा था। मैने मन ही मन सोचा कि आजकल के वास्तुशास्त्री किस राह में निकल पडे हैं।
            खैर मैने हर्षित से पूछा कि दक्षिण दिशा भारी होने पर कोई फायदा हुआ क्या? 6 माह बीत चुके हैं कोई फायदा नही हुआ इसलिए तो आपको बुलाया हैं।
                        वास्तु का अर्थ निर्माण से हैं। समराङ्गण सूत्रधार के अनुसार कोई भी निर्मित संरचना वास्तु हैं।  जिसमें व्यक्ति को वर्षा, गर्मी, सर्दी आदि से बचाव कि व्यवस्था की जाती हैं। तो क्या हम एक लोहे के पाईप के नीचे इन सभी ऋतुओं से बच सकते हैं यदि नही तो उपाय कारगर नही हैं। इस दृष्टिकोण से हमें स्वयं सोचना होगा।

3.         पिरामींड -  पिरामिंड का प्रयोग भी वास्तु सुधार संबंधी उपायो में से एक हैं कहीं इसका प्रयोग दरवाजो को बंद करने के रूप मे तो कही आकार में बडे पिरामिंडो का प्रयोग उर्जा नियेत्रण हेतु किया जाता हैं।  यदि मुख्य द्वार गलत दिशा में स्थित हो तो प्लास्टिक के छोटे आकार के पिरामिंडो प्रयोग द्वार को बन्द करने के लिए किया जाता हैं।  चित्र संख्या  ‘A-4’ के अनुसार पिरामिंडो को लगाकर यह कहतें हैं कि पिरामिंडो के प्वाइंट आपस में मैगनेटिक उर्जा के माध्यम से द्वार को बन्द करते हैं(चित्र संख्या ‘A-5’ के अनुसार )। आपका दोषपूर्ण द्वार हमने बंद कर दिया हैं ऐसा कहते हैं।


यहाँ हमें यह समझना होगा कि पिरामिंड लगाने के बाद भी हम आने जाने के लिए वही द्वार उपयोग मे ले रहें हैं तो कि पिरामिंडो द्वारा बंद किया जा चुका है। क्या हम किसी भी दिवार के आर पार आ जा सकते हैं यदि नही तो ये नासमझी क्यों।

तुला के मंगल और व्यक्तित्व परिवर्तन

ग्रहों केमंत्रीमडल में मंगल को सेनापति का स्थान प्राप्त है। सेनापति वह होता हैं, जिसमें नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं। सम्पूर्ण सेना का कार्यभार सेनापति के कंधो पर ही होता हैं।  हम अंदजा लगा सकते है कि इतने लोगो का नेतृत्व करने के लिए व्यक्ति को कितनी उर्जा की आवश्यकता होगी। मंगल को ज्योतिष जगत में Energy Source के रूप में जाना जाता है। वास्तु में इन्हे दक्षिण दिशा का स्वामित्व प्राप्त हैं। हमारे शास्त्रों / वेदों में दक्षिण दिशा में शयनकक्ष के प्रावधान होने का कारण भी शायद यही रहा हो। शयनकक्ष में स्थित व्यक्ति रातभर मंगल की उर्जा का अवशोषण करता हैं। जिससें वह परिवार के साथ-साथ समाज व कार्यक्षेत्र पर भी आसानी से Command कर सकें।
                        नवग्रहों में प्रत्येक ग्रह को अपना-अपना कारकत्व प्राप्त होता है। जैसे सूर्य पिता, सरकारी या स्वयं का व्यवसाय, अधिकारियों के साथ सामंजस्य का कारक है। शरीर में आत्मा, हड्डी, सिर का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार मंगल छोटे भाई-बहन, मामा, शरीर के घाव, फोडे-फून्सी, गांठ, संकल्पशक्ति, वाद-विवाद, झगड़े, रक्त, पित्त, साहस, शोर्य आदि का कारक है। मंगल प्रधान व्यक्ति में मंगल के रहन-सहन गुण देखने को मिलते हैं।
                        मंगल एक ऊर्जात्मक ग्रह है, जब ये पत्रिका में किसी भी प्रकार व्यक्ति को प्रभावित करते हैं तो भूमि-भवन, कोर्ट-कचहरी, साहस, तर्कशक्ति व अहम आदि से संबंधित विषयों से हानि-लाभ दिलवातें हैं। यदि पत्रिका में मंगल की स्थिती, गोचर व षडबल अच्छा हो तो व्यक्ति जीवन में सफलता के नये-नये रास्ते खुलने का यही समय होता हैं। वही यदि मंगल कमजोर, अस्त या शत्रु हो तो भारी कठिनाईयों का सामना करता है।
पत्रिका में स्थित मंगल का फल अच्छा या खराब प्राप्त होगा ये पत्रिका में चल रही दशा-अन्तर्दशा केसाथ-साथ गोचर पर भी निर्भर होता हैं। गोचर राशि से किस भाव में किस राशि से किस ग्रह के साथ व किन ग्रहों कि दृष्टि है भी मायने रखता हैं।

4 फरवरी 2014 को दोपहर 2:24 पर मंगल कन्या राशि से तुला राशि में प्रवेश करेंगें।
            मंगल अग्नितत्व ग्रह है और तुला जो कि वायुतत्व राशि हैं। अर्थात अग्नि+वायु का संयुक्त प्रभाव इन दिनों देखने को मिलेगा। तुला राशि में उत्तराफाल्गुनी, हस्त व चित्रा नक्षत्र आतें जिसके स्वामि सूर्य, चंद्रमा व मंगल हैं। ज्योतिष में सूर्य आत्मा ,अधिकारी वर्ग, चंद्रमा मन, तकनिकी विभाग हैं और तुला राशि के स्वामी ग्रह शुक्र हैं जो कि स्त्री के कारक हैं।  मंगल, सूर्य, चंद्रमा व शुक्र का संयुक्त असर हमें व्यक्ति समाज व देश में देखने को मिलेगा ये असर Positive  व Negative दोनो देखने को मिलेगा। एक ओर जहॉ स्त्रीयो से संबंधीत अपराध बढेगें। स्त्रीयॉ का देश में प्रभुत्व बढेगा। वही दुसरी ओर अफसरो, नेताओं में भी खीचातानी देखने को मिलेगी। Real Estate का कारोबार बढेगा साथ ही भूमि से संबंधित धोखाधडी के मामलो में भी वृद्धि होगी। अपराधिक मामले इस दौरान जयादा सक्रीय होगें।

मंगल का प्रत्येक राशि के व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा:-

मेष:- आपकी राशि मिथुन से गोचरवश मंगल सप्तम भाव में स्थित हैं। जन्मपत्रिका में सप्तम भाव स्त्री, साझेदारी (व्यापारिक), व्यापार आदि से संबंधित है। मंगल यहाँ स्थित होकर स्त्री से कलह, स्त्री के स्वास्थ्य संबंधी समस्या, यदि व्यापार साझेदारी का है तो साझेदारी द्वारा आर्थिक नुकसान होता है, जिसके परिणामस्वरूप  आप पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। मानसिक व शारीरिक कष्ट होता है। भइयो से विरोध स्वयं को कष्ट नेत्र विकार की संभावना बनी रहेगी, वैवाहिक सुख न के बराबर प्राप्त होगा। किन्तु मामा व संतान पक्ष से लाभ होता है। अविवाहितों के विवाह संबंधी मामलो  गोचर के उत्तराद्र्ध में आगें बढेगें।

वृषभ:- आपकी राशि में मंगल छठे भाव में गोचर कर रहे हैं।  छठा मंगल आपको अन्न, धन, बल, शत्रुओं पर विजय, यश प्राप्ति करवाता है। कार्यस्थल पर भी आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। यदि आप नोकरी करते हैं तो अधिकारी वर्ग अब आपके अनुकूल हो चलेंगे। अभी तक जो ऋण प्रबन्ध नही हो पा रहे थे वो अब धीरे-धीरे आगे बढने लगेंगें। विद्यार्थी वर्ग को आशनुकूल परिणाम प्राप्त होगें। प्रतियोगी परिक्षाओ में सफलता प्राप्ति का प्रतिशत बढेगा, यदि पत्रिका में अन्य ग्रहो के साथ-साथ दशा भी अनुकूल रही तो सफलता निश्चित है।

मिथुन:- आपकी राशि केअनुसार मंगल पंचम भाव में गोचर कर रहे हैं। मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा। यदि आप व्यापार करते हैं तो हानि होगी और नौकरी करते हैं तो अधिकारी वर्ग से परेशानी आएगी। समाज में प्रतिष्ठा घटने लगेगी। संतान को कष्ट होगा। इस समय जिन्हें संतान होने की उम्मीद चली आ रही है अर्थात् प्रेगेनेन्सी कन्फर्म हो चुकी थी, उन्हें विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह गोचर उनकी संतान के लिए अत्यनत कष्टकारी है। संतान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनैतिक तरीका न अपनाए अन्यथा भारी हानि उठानी होगी।

कर्क:- आपकी की जन्मराशि से मंगल गोचरवश चतुर्थ भाव में आ गए हैं, जन्मपत्रिका का चतुर्थ भाव जमीन-जायदाद, माता, रिश्ते-नाते, सुख-सुविधा, शिक्षा आदि से संबंधित होता है। मंगल का यह गोचर चतुर्थ भाव से संबंधित प्रत्येक विषयों पर विपरीत प्रभाव डालेगा, जैसे माता को शारीरिक कष्ट, शत्रु वृद्धि, स्त्री को कष्ट, कार्यस्थल पर असफलता, आय के साधनों में कमी, ज्वर, वक्षस्थल या रक्त विकार से संबंधित रोग, शत्रु वृद्धि, स्वजनों का विरोध, स्वयं के बल व पराक्रम में कमी होगी।

सिंह:-  आपकी राशि से मंगल का गोचर तृतीय भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर अच्छा होता है। पत्रिका का तृतीय भाव अन्य विषयों के साथ-साथ बल व पराक्रम से संबंधित भी होता है और मंगल ऊर्जावान व पराक्रम से संबंधित ग्रह हैं।
            पिछले समय से चली आ रही समस्याएँ समाप्त होने लगेगी। आपके शत्रु जो अब तककिसी न किसी रूप में परेशान कर रहे थे, अब आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे। आप अपने अंदर एक नवीन ऊर्जा को महसूस करेंगे। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। कोर्ट-कचहरी के मामले अब आपकेअनुकूल हो चलेंगें।

कन्या:- आपकी राशि से मंगल द्वितीय भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का द्वितीय भाव, धन, कुटुम्ब, वाणि आदि से संबंधित होता है। मंगल चूंकिऊर्जात्मकग्रह हैं और धनु राशि भी अग्नि तत्व है अर्थात् ऊर्जा ऊर्जा का भयंकर प्रवाह आपकी वाणि में देखने को मिलेगा, जिसके प्रभाव से लोग आपसे दूरी बनाने लगेंगे। जहाँ द्वादश शनि साढ़े साती के द्वारा कष्ट पहुंचाना शुरु कर  चुके थे, वही मंगल आग में घी का कार्य करेंगे। यदि आप विवाहित हैं तो जीवन साथी के साथ मतभेद बढ़ेगा। आपको चाहिए की आप मंगल देव की आराधना करें।

तुला:- इस  समय मंगल का गोचर आपकी राशि पर से हो रहा है। आपकी राशि धनु तथा ग्रहों में मंगल दोनों ही ऊर्जा प्रधान ग्रह हैं, परिणामस्वरूप मन बैचेन रहेगा, वाहन से कष्ट, संतान से व संतान को कष्ट, कार्यक्षेत्र पर अधिकारी वर्ग से परेशानी, व्रण, ज्वर या रक्त विकार, जीवन साथी को कष्ट आदि परिणाम प्राप्त होंगे। यात्राओं में भारी कष्ट होगा, जमीन-जायदाद से संंबंधित मामलों में हानि उठानी पड सकती हैं।

वृश्चिक:- आपकी जन्मराशि से मंगल गोचरवश द्वादश भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर शुभ नहीं होता है। पत्रिका का प्रत्येकभाव से 12वाँ भाव उस भाव की हानि करता है अर्थात् द्वादश मंगल शारीरिककष्ट, नेत्र रोग, जीवन साथी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, मान-सम्मान में कमी प्राप्त हो सकती हैं।
            पंचम भाव पुत्र से संबंधित होता है और पंचम से अष्टम द्वादश भाव हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संतान पक्ष को यर संतान से कष्ट प्राप्त हो सकता है। यदि संतान किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगी हो तो सफलता मिलना मुश्किल होगा।

धनु:- मंगल आपकी राशि में एकादश भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का एकादश आय, बड़े भाई-बहन, लाभ सिद्धि, वैभव आदि विषयों से संबंधित होता है। मंगल का इस भाव से गोचर एकादश भाव से संबंधित विषयों की प्राप्ति को दर्शाता । लाभ के साधन, व्यापार आदि इस गोचर में बढेगें। भाईयों का सहयोग प्राप्त होगा। शत्रु स्वत: ही परास्त होगें। कार्यों में सफलता मिलेगी।अविवाहित के विवाह संबंधी मामनले आगे बढेगें। इस समय आपको वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए।

मकर:- जन्म पत्रिका का दशम भाव व्यवसाय, नौकरी, मान-सम्मान, ज्ञान, पिता, कर्म, कीर्ति, जय-विजय आदि से संबंधित होता है। मंगल अपनी राशि मकर से दशम में गोचर कर रहे हैं। मंगल जहाँ अपनी राशि मेश से चतुर्थ है, वही दूसरी राशि वृश्चिक से द्वादश भी हैं। अत: इस समय कोई नवीन योजनाओ का क्रियांवयन न करे अन्यथा हानि उठानी पड सकती हैं।

कुंभ:- नवम भाव भाग्य व द्वितीय धन, कुटुम्ब से संबंधित है। मंगल इस गोचर में आपको जहाँ एकऔर धन प्राप्ति व भाग्य बढ़ायेंगे, वहीं दूसरी ओर आपमें एकअसीम ऊर्जा भी प्रवाहित करेंगे। व्यापार से लाभ होगा। भूमि-भवन से संबंधित मामले जोर पकड़ेंगे। पद-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
                        अब तक आपको जो शारीरिक व मानसिक कष्ट प्राप्त हो रहा था, उसमें अब धीरे-धीरे सुधार होने लगेगा। इस गोचर में छुट-पुट शत्रु उत्पन्न होंगे, धन की कमी सताने लगेगी, वहीं उत्तराद्र्ध में समस्त समस्याओं से छुटकारा प्राप्त होगा। कार्यस्थल पर आपके कार्या की प्रशंसा होगी। भूमि-भवन संबंधी मामले जोर पकडेगें।


मीन:- मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा क्योंकि इस समय मंगल आपकी राशि से अष्टम भाव अर्थात् आयु भाव में गोचरवश आ गए हैं। मंगल की यह स्थिति आपकी आय के स्त्रोत को भी प्रभावित करेगी।  गुदा प्रदेश केआस-पास या नेत्र से संबंधित रोग हो सकतें हैं। आयु का हृास, परेदेश-गमन, बल व पराक्रम को भी प्रभावित करेंगे। इस समय आपको चाहिये आप हनुमान जी की भरपूर सेवा करें।

Thursday, 25 July 2013

शरीर पर तिल के प्रभाव

सामुद्रिक शास्त्र ज्योतिष विद्या की एक अहम कडी है जिसमें  मानव शरीर पर बने तिल-मस्सों से उसके स्वभाव और भविष्य के बारें में सबसे सटिक भविष्यवाणी की जा सकती हैं। सामुद्रिक शास्त्र में शरीर के हर अंग पर बने तिलों का अलग-अलग प्रभाव होता है, जैसे -
गले पर तिल होना जातक के सुरीला होने की निशानी होती है।
वहीं स्त्रियों की छाती पर तिल का होने उनके पुत्रवान होने की भविष्यवाणी करता है आदि।
इसी तरह शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर बने अलग-अलग वर्ण और आकार के तिलों का अपना फलादेश होता है। इन तिलों के बारें में जानकर आप यह निर्णय ले सकते हैं कि सामने वाला इंसान कैसा है और कैसा नहीं? पुरुषों और महिलाओं के शरीर पर तिल का फलादेश कई जगह अलग-अलग होता है।

तिल का अंगानुसार प्रभाव -
  1. माथेपरतिल हो तो जातक बलवान होता है।
  2. जिस व्यक्ति के ललाट पर दायीं तरफ तिल हो, वह प्रतिभा का धनी होता है, और बायीं तरफ होनेपर व्यक्ति फिजूलखर्च करने वाला होता है।
  3. जिस के ललाट के मध्य में तिल हो, वह व्यक्ति अच्छा प्रेमी  सिद्ध होता हैं।
  4. ठुड्डी परतिल हो तो वह स्त्री से प्रेम नही करता, किंतु वह जिवन में सफल व संतुष्ट रहता है।
  5. दोनो भौहो के बीच तिल हो तो यात्रा बहुत करनी पड़ती है।
  6. दायीं भौ पर तिल वाले व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सफल रहता है।
  7. दाहिनी आंख पर तिल हो तो स्त्री प्रेमी होता है और बायींआंख परतिल हो तो स्त्री से विवाद या कलह होती है।
  8. आंख पर तिल व्यक्ति को कंजूस बनाता है।
  9. जिसके आंख के अंदर तिल हो, वह व्यक्ति नरमदिल अर्थात भावुक होता है।
  10. पलको पर तिल व्यक्ति को संवेदनशील और एकांतप्रिय बनाता है।
  11. दाएं गाल पर तिल हो तो जातक धनी होता है, और वैवाहिक जीवन सफल रहता है।
  12. बाएं गाल पर तिल हो तो जातक का खर्चीला होता है तथा उसका जीवन संघर्षपूर्ण रहता हैं।
  13. होठ पर तिल हो तो विषय-वासना में रत रहता हैं। या अधिक भेगी होता हैं।
  14. जिसके मुंह के पास तिल होता है, वह जीवन में खुब धन कमाता हैं।
  15. जिस व्यक्ति के नाक पर तिल होता हैं व अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारीत करता है और उसे प्राप्त भी करता हैं।
  16. कान पर तिल हो तो जातक अल्पायु होता है, परन्तु वह धीर-गंभीर और विचारो वाला होता है।
  17. गर्दन पर तिल वाला व्यक्ति अच्छा मित्र साबीत होता हैं साथ ही उसे जीवन में सभी चीजे आसानी से प्राप्त हो जाती हैं।
  18. दाएं कंधे पर तिल वाले व्यक्ति दृढ संकल्पी होते हैं।
  19. दाहिनी भुजा पर तिल मान-सम्मान दिलवाता हैं वही बायीं भुजा पर तिल व्यक्ति को झगड़ालू बनाता है।
  20. नाक पर तिल हो तो यात्रा बहुत करनी पड़ती हों जो लाभकारी भी होती हैं।
  21. जिसके बाएं कंधे पर तिल होता है, वह व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है।
  22. कंधे और कोहनी के मध्य तिल व्यक्ति को उत्सुक प्रवृती का बनाता है।
  23. कोहनी पर तिल होना विद्वान होने का संकेत है।
  24. दाहिनी छाती पर तिल स्त्री से प्यार करने वाला तथा बायीं छाती पर तिल स्त्री से होने वाले मतभेद को बतलाता है।
  25. कमर पर तिल हो तो जीवन परेशानियो भरा होता हैं। कमर पर दायीं ओर तिल होना यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपनी बात पर अटल रहने वाला और सच्चाई पसंद करने वाला है।
  26. दोनो छाती के मध्य में तिल हो तो जीवन सुख से व्यतित होता हैं।
  27. पेट पर तिल हो तो जातक अच्छा भोजन में रुची रखता हैं।
  28. पीठ पर तिल व्यक्ति को यात्रा करवाता है।
  29. नाभि पर तिल मनमौजी प्रवृती देता है।
  30. टखनें पर तिल इस बात का सूचक है कि व्यक्ति खुले विचारो वाला है।
  31. कूल्हे पर तिल व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक दोनो प्ररिश्रम देता हैं।
  32. दायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति शक्तिशाली बनाता है।
  33. बायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति बहुत खर्चीला होता है।
  34. दाए हाथ के ऊपर तिल व्यक्ति को धनी बनाता है, और बाएं हाथ के ऊपर तिल कंजूस प्रवृती देता है।
  35. जिस व्यक्ति के कोहनी और पोंहचे के मध्य कही तिल होता है, वह रोमांटिक प्रवृती का होता है।
  36. जिसके घुटने पर तिल हो, वह व्यक्ति सफल वैवाहिक जीवन जीता है।
  37. दाएं पैर में तिल व्यक्ति बुद्धीमान और बाएं पैर पर  तिल व्यक्ति को खर्चीला बनाता हैं।
  38. पांव पर तिल लापरवाही देता हैं।
  39. जोडो पर तिल होना शारिरीक दुर्बलता देता हैं।
  40. तिल यदि बड़ा हो, तो शुभ होने के साथ-साथ अच्छे शकुन को बढ़ाता है।
  41. यदि तिल पर बाल हो, तो वो शुभ नही माना जाता।
  42. तिल गहरे रंग का हो, तो माना जाता है कि बडी बाधाएं सामने आएंगी और जिस अंग का जो फल सामुद्रिक शास्त्र में जो वर्णित हैं व अत्यधिक प्राप्त होता हैं।

Sunday, 14 July 2013

Guru Poornima

गुरुपूर्णिमा ही व्यासपूर्णिमा  -  ( 22 जुलाई, 2013 )

आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विद्यान हैं। वैदिक काल में समस्त परिव्राजक साधुगण एक ही स्थान पर रुककर चार माह तक ज्ञान की गंगा बहाते थे। इन चार माह में सर्दी व गर्मी एक समान रहती है जो कि अध्ययन व अध्यापन के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

वैसे ये चार माह वो ही हैं जब प्रभु शयनावस्था में होते है। इन चार माह को चतुर्मास भी कहते हैं। प्रभु के शयनावस्था में होने से अंधकार न फैले, इसके लिए संत इन महिनों में अपनी ज्ञान गंगा जनसाधारण में फैलाते रहते हैं।  जिस प्रकार सूर्य से तपती भूमि को वर्षा की शीतलता की आवश्यकता होती है, अन्न (फसल) पैदा करने के लिए। इसी प्रकार गुरु चरण में उपस्थित  साधको को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त होती हैं।

गु का अर्थ अंधकार से व रु का अर्थ उसका निरोधक से हैं, अर्थात अंधकार को हटाकर जो प्रकाश की और ले गुरु कहते हैं।
जाए उसे

इसी दिन महाभारत के रचयिता वेदव्यास ही का भी जन्म हुआ था, जिन्होनें जनकल्याण हेतु चारों वेदों का संकलन कर 18 पुराण व उपपुराणो की रचना की। चार वेदो के अतिरिक्त पंचम वेद महाभारत की रचना वेदव्याय जी ने इसी दिन संपन्न की थी, तब से इन्हें आदिगुरु की उपाधि प्राप्त हुई थी। इनके सम्मान में गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा के नाम से भी जाना जाने लगा।

वैदिक काल में जब गुरु के आश्रम में विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करतें थे, तो इसी दिन विद्यार्थी अपने सामथ्र्यानुसार अपने गुरु को दक्षिणा देकर सम्मानित करतें थे।

आज भी इसका महत्व बरकरार हैं। विद्यालयों, संगीत, कला व वैदिक ज्ञान प्राप्त कर रहें विद्यार्थी इस दिन अपने गुरुजनों का सम्मान करतें हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में गुरु की आवश्यक्ता पडती हैं, जो उसें पापमार्ग से निकालकर सद्मार्ग पर ले जाए ताकि वह जीवन के उच्चतम शिखर को प्राप्त कर सकें।

इसकी पुष्टि इन दोहो से होती हैं।

गुरु गोविंद दोऊ खडे, किसको लागुं पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥

राम कृष्ण सबसे बडा, उन्हूँ तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के व धनी, गुरु आज्ञा आधीन।।

Friday, 22 March 2013

वास्तु टिप्स

 
  1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्वी) में झाडू-पोचा या कुड़ादान नहीं रखना चाहिए ।
  2. सांयकाल में झाडू-पौंछे का काम नहीं करना चाहिए ।
  3. पूर्वमुखी मकान में जूते रखने का स्थान प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ नही होना चाहियें।
  4. घर में टूटा दर्पण, टूटी चारपाई, बंद घडी या किसी बन्द मशीन का रखा होना सुख समृद्धि की दृष्टि से अशुभ-कारक है ।
  5. घर में उत्तर दिशा के कमरे में जेवर, गहने, सोने-चाँदी का सामान रखने से इनकी संख्या में बढोतरी होती हैं।
  6. अनाज का कमरा उत्तर दिशामध्य से उत्तर-पश्चिम कोण के मध्य होना चाहिए। ऐसा करने से घर में संपन्नता बनी रहती हैं।
  7. किसी कारणवश यदि पूजाघर ईशान कोण में नही लग पा रहा हैं तो पूर्व या उत्तर दिशा में भी व्यवस्था कि जा सकती हैं।
  8. घर में शेर, गिद्ध, बाज आदि के चित्र नही होने चाहिये।
  9. घर के ईशान कोण पर कूड़ा-कर्कट भी इकठ्ठा न होने दें ।
  10. यदि भूमि कछुए के पीठ के समान मध्य से ऊँची हो, तो ऐसे भूखण्ड पर निवास करने से धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।
  11. घर में काँटेदार एवं दूध वाले वृक्षों का रोपण नहीं करना चाहिए । चम्पा, चमेली, अनार, केला, हरसिंगार के वृक्ष शुभ माने जाते हैं । 
  12. भूमि में यदि उत्तर-पूर्वी कोण (ईशान) में ढलान हो या तल नीचा हो, तो गृह स्वामी को धन एवं सुख प्रदान करती है ।
  13. ईंट, पत्थर, लकड़ी इत्यादि नये भवन के निर्माण में नये ही लगाने चाहिए । किसी पुराने भवन से उखाड़कर नये भवन के निर्माण में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए ।
  14. यदि घर का मुख्य द्वार स्वत: ही खुलता या बन्द होता हैं तो यह अशुभ सुचक माना जाता हैं।
  15. द्वार के ऊपर यदि द्वार का निर्माण करना हो तो उपर के द्वार का माप नीचे के द्वार के माप से कुछ कम होना चाहिये।
  16. दरवाजा टेढ़ा-मेढ़ा, जोड़ लगा हुआ, लटका हुआ नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो घर में संकट के बादल छाए रहते हैं।
  17. चौखट यदि एक ओर बड़ी और दूसरी ओर छोटी हो, तो इसे अशुभ फल-प्रदायक माना जाता है।
  18. घर के खिड़की दरवाजे इस प्रकार होनी चाहिए, कि सूर्य का प्रकाश ज्यादा से ज्यादा समय के लिए घर के अंदर आए। इससे घर की बीमारियां दूर भागती हैं।
  19. रसोई घर में पूजा की अल्मारी या मंदिर नहीं रखना चाहिए।
  20. घर में शौचालय के बगल में देवस्थान नहीं होना चाहिए।

Tuesday, 18 December 2012

शक्ति रूद्राक्ष - शिव

रूद्राक्ष शब्द रूद्र + अक्ष से बना है।  रूद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप है, इसमें भगवान शिव की शक्ति विद्यमान है। रूद्र का अर्थ शिव होता है तथा अक्ष का आंसू अर्थात् शिव का आंसू ही रूद्राक्ष हैं। जिस प्रकार शिव का अर्थ कल्याण होता है, उसी प्रकार रूद्राक्ष भी कल्याणकारी होता है। हमारे ग्रंथों में भी रूद्राक्ष का वर्णन एवं महात्म्य वर्णित हैं। रूद्राक्ष की उत्पत्ति के संदर्भ में जो कथा प्रचलित हैं वो इस प्रकार हैं।
प्राचीन काल में त्रिपुरासुर नामक एक महाबली दैत्य था, उस दैत्य को मारने व देवताओं की रक्षा एवं समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने के लिए जब शिवजी किसी अघोरास्त्र की रचना पर विचार कर रहें थे।  उस समय उनके थके हुए तथा उन्मेलित नेत्रों से जल की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरी। उन  बूंदों से ही रूद्रक्ष की उत्पत्ति हुई।
रूद्राक्षाणां फलं तस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
लक्षं तत्स्पर्शने पुण्यं कोटिर्भवति मालनात्
रूद्राक्ष फल के स्पर्श मात्र से ही कई लाख गुणा पुण्य प्राप्त होता है तथा धारण रकरने पर तो कोटि-कोटि फल प्राप्त होता है।
रूद्रक्ष के प्रकार - रूद्रक्ष चार प्रकार के होते है।
1. सफेद
2. लाल
3. मिश्रित
4. काला

आकार के हिसाब से आंवले के बराबर आकार का रूद्राक्ष श्रेष्ठ माना जाता है। रूद्राक्ष में धारियां होती हैं, इन धारियों को ही मुख कहा जाता है। यह एक से लेकर चौदह मुखी तक होती हैं।
रूद्राक्ष के फल -
1.    रूद्राक्ष धारण किए मनुष्य से, शिव, विष्णु देवी गणेश, सूर्य आदि सभी देवता प्रसन्न होते हैं।
2.    रूद्राक्ष की माला द्वारा जपने से मंत्र समस्त फल देने वाले होते हैं।
3.    रूद्राक्ष के मुख से ब्रह्मा, मध्य में रूद्र तथा तल में विष्णु का निवास होता है।

एक से चौदह मुखी रूद्राक्ष के अलग-अलग कार्य होते हैं। जो इस प्रकार हैं।

एक मुखी: एक मुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव है। यह अत्यन्त दुर्लभ होता है। यह अन्य रूद्राक्षो के मुकाबले बहुत ही कम पैदा होता हैं। इसको धारण करने से सभी प्रकार के पापों का शमन होता है तथा यह धन धान्य देने वाला, रोगमुक्ति शत्रु पर विजय पाने वाला तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला होता है।
विशेष -  एक मुखी रूद्रक्ष यदि गल्ले में रखें तो कभी धन की कमी नही होगी। उसपर सदैव शिव की कृपा बनी रहेगी।

    दो मुखी: दो मुखी रूद्राक्ष अद्र्धनारीश्वर स्वरूप हैं। यह शिव तथा शक्ति का संयुक्त रूप हैं। इसे धारण करने से  तामसिक वृत्तियों का परिहार, चित्त एकाग्रता, मानसिक शांति ,आध्यात्मिक उत्थान व कुण्डलिनी जाग्रत होती हैं। यह श्रद्धा  तथा विश्वास का प्रतिक हैं।




तीन मुखी: इसको अग्नि का स्वरूप हैं।  यह सत, रज तथा तम का त्रिगुणात्मक शक्ति रूप हैं। इस रूद्राक्ष में ब्रहा, विष्णु, महेश तीनो देवो कि शक्तियों का समावेश हैं। इसको धारण करने से व्यक्ति क्रियाशील रहता है। यदि नौकरी नही लग रही हो, व्यक्ति बेकार ही बैठा हो तो यह रूद्राक्ष फायदेमंद रहता है। व्यक्ति के समस्त पापो का क्षय करता है तथा दया, धर्म, परोपकार के भाव जाग्रत करता हैं।


चार मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप है, इसमें चार वेदों का समावेश है। यह व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाला है, इस रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति आरोग्यवान, ज्ञानवान, बुद्धिवान होता है। अग्निपुराण में यहाँ तक लिखा है कि इसके प्रभाव से व्याभिचारी भी ब्रह्मचारी तथा मस्तिष्क आस्तिम हो जाता है।
विशेष:- चार वेदों के समावेश से यह विद्यार्थी व ज्योतिषविदों के लिए परम लाभदायक है।
पंचमुखी रुद्राक्ष: इसको कालाग्नि के नाम से जानते हैं, यह स्वयं रुद्र स्वरूप है, इसमें शिव के पाँचों रुप (रुधेजात, ईशान, तत्पुरुष, अधोर तथा कामदेव) विद्यमान हैं, जिससे यह पर उपयोगी हो जाता है। इसे धारण करने से हृदय स्वच्छ, मन शांत तथा दिमाग को शांति प्रदान करता है, यह शत्रुओं को परास्त, रोगों के नाश, प्रेत बाधा की समाप्ति करने में सक्षम है।
विशेष:- इसे कम से कम 3 या पाँच की संख्या में ही धारण करें।
 छ: मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष परमकल्याणकारी है। जहाँ यह एक ओर कात्र्तिकेय की शक्ति का केन्द्र बिन्दु है, वहीं दूसरी तरफ गणपति के विद्या, ज्ञान, बुद्धि का प्रतीक भी है। यह रुद्राक्ष छ: प्रकार की बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोक्ष, मोह, मद, मत्सर) को भी नष्ट करता है। इसे धारण करने पर व्यक्ति दरिद्रता, चर्म रोगों से मुक्त होकर लक्ष्मीवान हो जाता है।


सप्तमुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष सप्तऋषियों का स्वरूप है। अत: इसमें सप्त ऋषियों का आशीर्वाद (ओज, तेज, ज्ञान, बल) विद्यमान है। यदि किसी व्यक्ति के मारकेश की दशा चल रही हो या साढ़ेसाती के प्रभाव में कष्ट  पा रहा हो तो उसने अशुभ प्रभाव की शांति हेतु इसे धारण करना चाहिए। यह धन-सम्पत्ति, कीर्ति और विजय प्रदान करने में भी सक्षम है।




Thursday, 8 November 2012

क्या बदलाव लाएगें धनु के मंगल आपके जीवन में ?

नवग्रहों में प्रत्येक ग्रह को अपना-अपना कारकत्व प्राप्त होता है। जैसे सूर्य पिता, सरकारी या स्वयं का व्यवसाय, अधिकारियों के साथ सामंजस्य का कारक है। शरीर में आत्मा, हड्डी, सिर का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार मंगल छोटे भाई-बहन, मामा, ब्रण (घाव), वाद-विवाद, झगड़े, सज्जा, रक्त, पित्त, साहस, शोर्य आदि का कारक है। मंगल प्रधान व्यक्ति में मंगल के रहन-सहन गुण देखने को मिलते हैं।
                        मंगल एक ऊर्जात्मक ग्रह है, जब ये पत्रिका में किसी भी प्रकार व्यक्ति को प्रभावित करते हैं तो भूमि-भवन, कोर्ट-कचहरी, साहस, तर्क, शक्ति व  अहम आदि से संबंधित विषयों से हानि-लाभ दिलवातें हैं। यदि पत्रिका में मंगल की स्थिती व षडबल में बल भी अच्छा हो तो व्यक्ति जीवन में सफलता के नये-नये रास्ते खोजता है। वही यदि मंगल कमजोर, अस्त या शत्रु हो तो भारी कठिनाईयों का सामना करता है।
9 नवम्बर 2012 को मंगल अपनी राशि वृश्चिक से धनु राशि में गोचरवश पहुंच जाएंगे।
यहाँ ये 13 दिसम्बर तक रहेंगे। प्रत्येक राशि पर इनका अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा:-
मेष:- आपकी राशि से मंगल भाग्य भाव में गोचर करेंगे, अब तक आपको जो शारीरिक व मानसिक कष्ट हो रहा  था, अब धीरे-धीरे उसमें सुधार होने लगेगा, मंगल चूंकि आपकी राशि मेष के स्वामी हैं और नवम में गोचर कर रहे हैं। इस गोचर में जहाँ पूर्वाद्र्ध में शारीरिक कमजोरी महसूस होगी, छुट-पुट शत्रु उत्पन्न होंगे, धन की कमी सताने लगेगी, वहीं उत्तराद्र्ध में समस्त समस्याओं से छुटकारा प्राप्त होगा।
    जमीन-जायदाद से संबंधित मामलें, जो कोर्ट में चल रहे हैं या क्रय-विक्रय का विचार है, किन्तु उसकी पूर्णता पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो अब यह मामले पूर्ण होने लगेंगे। घर की आवश्यकतायें कर्ज के रूप में पूरी होगी। जीवनसाथी से चली आ रही रोक-टोक प्यार में बदलने लगेगी। यात्रा सफल रहेगी।

वृषभ:- मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा क्योंकि इस समय मंगल आपकी राशि से अष्टम भाव अर्थात् आयु भाव में गोचरवश आ गए हैं। मंगल की यह स्थिति आपकी आय के स्त्रोत को भी प्रभावित करेगी। गुदा प्रदेश के आस-पास या नेत्र से संबंधित रोग हो सकतें हैं। आयु का हृास, परेदेश-गमन, बल व पराक्रम को भी प्रभावित करेंगे। इस समय आपको चाहिये आप हनुमान जी की भरपूर सेवा करें।

मिथुन:- आपकी राशि मिथुन से गोचरवश मंगल सप्तम भाव में स्थित हैं। जन्मपत्रिका में सप्तम भाव स्त्री, साझेदारी (व्यापारिक), व्यापार आदि से संबंधित है। मंगल यहाँ स्थित होकर स्त्री से कलह, स्त्री के स्वास्थ्य संबंधी समस्या, यदि व्यापार साझेदारी का है तो साझेदारी द्वारा आर्थिक नुकसान होता है, जिसके परिणामस्वरूप  आप पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। मानसिक व शारीरिक कष्ट होता है। साथ ही स्वयं के भाइयों से शत्रुता प्रधान करेंगे, वैवाहिक सुख न के बराबर प्राप्त होगा। किन्तु मामा व संतान पक्ष से लाभ होता है।
कर्क:- आपकी राशि में मंगल छठे भाव में गोचर कर रहे हैं। अत : आपको जो संतान पक्ष की चिंता या उनके द्वारा प्रदान किये जाने वाले कष्ट, शत्रु पीड़ा, मान-प्रतिष्ठा में लगातार हो रही कमी से दुखी थे अब उनसे सबसे छुटकारा मिल ने लगेगा।
    छठा मंगल आपको अन्न, धन, बल, शत्रुओं पर विजय, यश प्राप्ति करवाता है। कार्यस्थल पर भी आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। यदि आप सर्विस करते हैं तो अधिकारी वर्ग अब आपके अनुकूल हो चलेंगे। घर, जमीन या वाहन खरीदने का योग बनेगा।

सिंह:- आपकी राशि के अनुसार मंगल पंचम भाव में गोचर कर रहे हैं। मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा। यदि आप व्यापार करते हैं तो हानि होगी और नौकरी करते हैं तो अधिकारी वर्ग से परेशानी आएगी। समाज में प्रतिष्ठा घटने लगेगी। संतान को कष्ट होगा। इस समय जिन्हें संतान होने की उम्मीद चली आ रही है अर्थात् प्रेगेनेन्सी कन्फर्म हो चुकी थी, उन्हें विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह गोचर उनकी संतान के लिए अत्यनत कष्टकारी है। संतान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनैतिक तरीका न अपनाए अन्यथा भारी हानि उठानी होगी।

कन्या:- आपकी की जन्मराशि से मंगल गोचरवश चतुर्थ भाव में आ गए हैं, जन्मपत्रिका का चतुर्थ भाव जमीन-जायदाद, माता, रिश्ते-नाते, सुख-सुविधा, शिक्षा आदि से संबंधित होता है। मंगल का यह गोचर चतुर्थ भाव से संबंधित प्रत्येक विषयों पर विपरीत प्रभाव डालेगा, जैसे माता को शारीरिक कष्ट, शत्रु वृद्धि, स्त्री को कष्ट, कार्यस्थल पर असफलता, आय के साधनों में कमी, ज्वर, वक्षस्थल या रक्त विकार से संबंधित रोग, शत्रु वृद्धि, स्वजनों का विरोध, स्वयं के बल व पराक्रम में कमी होगी।

तुला:- आपकी राशि से मंगल का गोचर तृतीय भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर अच्छा होता है। पत्रिका का तृतीय भाव अन्य विषयों के साथ-साथ बल व पराक्रम से संबंधित भी होता है और मंगल ऊर्जावान व पराक्रम से संबंधित ग्रह हैं।
    पिछले समय से चली आ रही समस्याएँ समाप्त होने लगेगी। आपके शत्रु जो अब तक किसी न किसी रूप में परेशान कर रहे थे, अब आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे। आप अपने अंदर एक नवीन ऊर्जा को महसूस करेंगे। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। कोर्ट-कचहरी के मामले अब आपके पक्ष में होने लगेंगे।

वृश्चिक:- आपकी राशि से मंगल द्वितीय भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का द्वितीय भाव, धन, कुटुम्ब, वाणि आदि से संबंधित होता है। मंगल चूंकि ऊर्जात्मक ग्रह हैं और धनु राशि भी अग्नि तत्व है अर्थात् ऊर्जा ऊर्जा का भयंकर प्रवाह आपकी वाणि में देखने को मिलेगा, जिसके प्रभाव से लोग आपसे दूरी बनाने लगेंगे। जहाँ द्वादश शनि साढ़े साती के द्वारा कष्ट पहुंचाना शुरु कर  चुके थे, वही मंगल आग में घी का कार्य करेंगे। यदि आप विवाहित हैं तो जीवन साथी के साथ मतभेद बढ़ेगा। आपको चाहिए की आप मंगल देव की आराधना करें।

धनु:- इस  समय मंगल का गोचर आपकी राशि पर से हो रहा है। आपकी राशि धनु तथा ग्रहों में मंगल दोनों ही ऊर्जा प्रधान ग्रह हैं, परिणामस्वरूप मन बैचेन रहेगा, वाहन से कष्ट, संतान से व संतान को कष्ट, कार्यक्षेत्र पर अधिकारी वर्ग से परेशानी, व्रण, ज्वर या रक्त विकार, जीवन साथी को कष्ट आदि परिणाम प्रापत होंगे।
यात्राओं में भारी कष्ट होता है, जमीन-जायदाद से संंबंधित मामलों में कष्ट होता है।

मकर:- आपकी जन्मराशि से मंगल गोचरवश द्वादश भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर शुभ नहीं होता है। पत्रिका का प्रत्येक भाव से 12वाँ भाव उस भाव का खण्डन करता है अर्थात् द्वादश मंगल शारीरिक कष्ट, नेत्र रोग, जीवन साथी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, मान-सम्मान में कमी।
    पंचम भाव पुत्र से संबंधित होता है और पंचम से अष्टम द्वादश भाव हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संतान पक्ष को कष्ट होता है। यदि संतान किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगी हो तो सफलता नहीं मिलेगी।

कुंभ:- मंगल आपकी राशि में एकादश भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का एकादश आय, बड़े भाई-बहन, लाभ सिद्धि, वैभव आदि विषयों से संबंधित होता है। मंगल का इस भाव से गोचर एकादश भाव से संबंधित विषयों की प्राप्ति को दर्शाता है अर्थात् समय अनुकूल होने लगता है। लाभ के साधन बढ़ते हैं। व्यापार भी बढ़ता है। भाईयों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही शत्रु परास्त होते हैं। कार्यों में सफलता मिलती है। जो अविवाहित हैं, उनके विवाह तय होते हैं। इस समय आपको वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। साथ ही  विवाहित  हैं तो संतान का ध्यान रखें, उन्हें कुछ कष्ट हो सकता है।

मीन:- जन्म पत्रिका का दशम भाव व्यवसाय, नौकरी, मान-सम्मान, ज्ञान, पिता, कर्म, कीर्ति, जय-विजय आदि से संबंधित होता है। मंगल अपनी राशि मीन से दशम में गोचर कर रहे हैं। मंगल जहाँ अपनी राशि मेश से नवम है, वही दूसरी राशि वृश्चिक से द्वितीय भी हैं।
    नवम भाव भाज्य व द्वितीय धन, कुटुम्ब से संबंधित है। मंगल इस गोचर में आपको जहाँ एक और धन प्राप्ति व भाग्य बढ़ायेंगे, वहीं दूसरी ओर आपमें एक असीम ऊर्जा भी प्रभावित करेंगे। व्यापार से लाभ होगा। भूमि-भवन से संबंधित मामले जोर पकड़ेंगे। पद-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।