Sunday, 14 July 2013

Guru Poornima

गुरुपूर्णिमा ही व्यासपूर्णिमा  -  ( 22 जुलाई, 2013 )

आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विद्यान हैं। वैदिक काल में समस्त परिव्राजक साधुगण एक ही स्थान पर रुककर चार माह तक ज्ञान की गंगा बहाते थे। इन चार माह में सर्दी व गर्मी एक समान रहती है जो कि अध्ययन व अध्यापन के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

वैसे ये चार माह वो ही हैं जब प्रभु शयनावस्था में होते है। इन चार माह को चतुर्मास भी कहते हैं। प्रभु के शयनावस्था में होने से अंधकार न फैले, इसके लिए संत इन महिनों में अपनी ज्ञान गंगा जनसाधारण में फैलाते रहते हैं।  जिस प्रकार सूर्य से तपती भूमि को वर्षा की शीतलता की आवश्यकता होती है, अन्न (फसल) पैदा करने के लिए। इसी प्रकार गुरु चरण में उपस्थित  साधको को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त होती हैं।

गु का अर्थ अंधकार से व रु का अर्थ उसका निरोधक से हैं, अर्थात अंधकार को हटाकर जो प्रकाश की और ले गुरु कहते हैं।
जाए उसे

इसी दिन महाभारत के रचयिता वेदव्यास ही का भी जन्म हुआ था, जिन्होनें जनकल्याण हेतु चारों वेदों का संकलन कर 18 पुराण व उपपुराणो की रचना की। चार वेदो के अतिरिक्त पंचम वेद महाभारत की रचना वेदव्याय जी ने इसी दिन संपन्न की थी, तब से इन्हें आदिगुरु की उपाधि प्राप्त हुई थी। इनके सम्मान में गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा के नाम से भी जाना जाने लगा।

वैदिक काल में जब गुरु के आश्रम में विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करतें थे, तो इसी दिन विद्यार्थी अपने सामथ्र्यानुसार अपने गुरु को दक्षिणा देकर सम्मानित करतें थे।

आज भी इसका महत्व बरकरार हैं। विद्यालयों, संगीत, कलावैदिक ज्ञान प्राप्त कर रहें विद्यार्थी इस दिन अपने गुरुजनों का सम्मान करतें हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में गुरु की आवश्यक्ता पडती हैं, जो उसें पापमार्ग से निकालकर सद्मार्ग पर ले जाए ताकि वह जीवन के उच्चतम शिखर को प्राप्त कर सकें।

इसकी पुष्टि इन दोहो से होती हैं।

गुरु गोविंद दोऊ खडे, किसको लागुं पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥

राम कृष्ण सबसे बडा, उन्हूँ तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के व धनी, गुरु आज्ञा आधीन।।