Sunday, 14 July 2013

Guru Poornima

गुरुपूर्णिमा ही व्यासपूर्णिमा  -  ( 22 जुलाई, 2013 )

आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विद्यान हैं। वैदिक काल में समस्त परिव्राजक साधुगण एक ही स्थान पर रुककर चार माह तक ज्ञान की गंगा बहाते थे। इन चार माह में सर्दी व गर्मी एक समान रहती है जो कि अध्ययन व अध्यापन के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

वैसे ये चार माह वो ही हैं जब प्रभु शयनावस्था में होते है। इन चार माह को चतुर्मास भी कहते हैं। प्रभु के शयनावस्था में होने से अंधकार न फैले, इसके लिए संत इन महिनों में अपनी ज्ञान गंगा जनसाधारण में फैलाते रहते हैं।  जिस प्रकार सूर्य से तपती भूमि को वर्षा की शीतलता की आवश्यकता होती है, अन्न (फसल) पैदा करने के लिए। इसी प्रकार गुरु चरण में उपस्थित  साधको को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त होती हैं।

गु का अर्थ अंधकार से व रु का अर्थ उसका निरोधक से हैं, अर्थात अंधकार को हटाकर जो प्रकाश की और ले गुरु कहते हैं।
जाए उसे

इसी दिन महाभारत के रचयिता वेदव्यास ही का भी जन्म हुआ था, जिन्होनें जनकल्याण हेतु चारों वेदों का संकलन कर 18 पुराण व उपपुराणो की रचना की। चार वेदो के अतिरिक्त पंचम वेद महाभारत की रचना वेदव्याय जी ने इसी दिन संपन्न की थी, तब से इन्हें आदिगुरु की उपाधि प्राप्त हुई थी। इनके सम्मान में गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा के नाम से भी जाना जाने लगा।

वैदिक काल में जब गुरु के आश्रम में विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करतें थे, तो इसी दिन विद्यार्थी अपने सामथ्र्यानुसार अपने गुरु को दक्षिणा देकर सम्मानित करतें थे।

आज भी इसका महत्व बरकरार हैं। विद्यालयों, संगीत, कला व वैदिक ज्ञान प्राप्त कर रहें विद्यार्थी इस दिन अपने गुरुजनों का सम्मान करतें हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में गुरु की आवश्यक्ता पडती हैं, जो उसें पापमार्ग से निकालकर सद्मार्ग पर ले जाए ताकि वह जीवन के उच्चतम शिखर को प्राप्त कर सकें।

इसकी पुष्टि इन दोहो से होती हैं।

गुरु गोविंद दोऊ खडे, किसको लागुं पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥

राम कृष्ण सबसे बडा, उन्हूँ तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के व धनी, गुरु आज्ञा आधीन।।

Friday, 22 March 2013

वास्तु टिप्स

 
  1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्वी) में झाडू-पोचा या कुड़ादान नहीं रखना चाहिए ।
  2. सांयकाल में झाडू-पौंछे का काम नहीं करना चाहिए ।
  3. पूर्वमुखी मकान में जूते रखने का स्थान प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ नही होना चाहियें।
  4. घर में टूटा दर्पण, टूटी चारपाई, बंद घडी या किसी बन्द मशीन का रखा होना सुख समृद्धि की दृष्टि से अशुभ-कारक है ।
  5. घर में उत्तर दिशा के कमरे में जेवर, गहने, सोने-चाँदी का सामान रखने से इनकी संख्या में बढोतरी होती हैं।
  6. अनाज का कमरा उत्तर दिशामध्य से उत्तर-पश्चिम कोण के मध्य होना चाहिए। ऐसा करने से घर में संपन्नता बनी रहती हैं।
  7. किसी कारणवश यदि पूजाघर ईशान कोण में नही लग पा रहा हैं तो पूर्व या उत्तर दिशा में भी व्यवस्था कि जा सकती हैं।
  8. घर में शेर, गिद्ध, बाज आदि के चित्र नही होने चाहिये।
  9. घर के ईशान कोण पर कूड़ा-कर्कट भी इकठ्ठा न होने दें ।
  10. यदि भूमि कछुए के पीठ के समान मध्य से ऊँची हो, तो ऐसे भूखण्ड पर निवास करने से धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।
  11. घर में काँटेदार एवं दूध वाले वृक्षों का रोपण नहीं करना चाहिए । चम्पा, चमेली, अनार, केला, हरसिंगार के वृक्ष शुभ माने जाते हैं । 
  12. भूमि में यदि उत्तर-पूर्वी कोण (ईशान) में ढलान हो या तल नीचा हो, तो गृह स्वामी को धन एवं सुख प्रदान करती है ।
  13. ईंट, पत्थर, लकड़ी इत्यादि नये भवन के निर्माण में नये ही लगाने चाहिए । किसी पुराने भवन से उखाड़कर नये भवन के निर्माण में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए ।
  14. यदि घर का मुख्य द्वार स्वत: ही खुलता या बन्द होता हैं तो यह अशुभ सुचक माना जाता हैं।
  15. द्वार के ऊपर यदि द्वार का निर्माण करना हो तो उपर के द्वार का माप नीचे के द्वार के माप से कुछ कम होना चाहिये।
  16. दरवाजा टेढ़ा-मेढ़ा, जोड़ लगा हुआ, लटका हुआ नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो घर में संकट के बादल छाए रहते हैं।
  17. चौखट यदि एक ओर बड़ी और दूसरी ओर छोटी हो, तो इसे अशुभ फल-प्रदायक माना जाता है।
  18. घर के खिड़की दरवाजे इस प्रकार होनी चाहिए, कि सूर्य का प्रकाश ज्यादा से ज्यादा समय के लिए घर के अंदर आए। इससे घर की बीमारियां दूर भागती हैं।
  19. रसोई घर में पूजा की अल्मारी या मंदिर नहीं रखना चाहिए।
  20. घर में शौचालय के बगल में देवस्थान नहीं होना चाहिए।

Tuesday, 18 December 2012

शक्ति रूद्राक्ष - शिव

रूद्राक्ष शब्द रूद्र + अक्ष से बना है।  रूद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप है, इसमें भगवान शिव की शक्ति विद्यमान है। रूद्र का अर्थ शिव होता है तथा अक्ष का आंसू अर्थात् शिव का आंसू ही रूद्राक्ष हैं। जिस प्रकार शिव का अर्थ कल्याण होता है, उसी प्रकार रूद्राक्ष भी कल्याणकारी होता है। हमारे ग्रंथों में भी रूद्राक्ष का वर्णन एवं महात्म्य वर्णित हैं। रूद्राक्ष की उत्पत्ति के संदर्भ में जो कथा प्रचलित हैं वो इस प्रकार हैं।
प्राचीन काल में त्रिपुरासुर नामक एक महाबली दैत्य था, उस दैत्य को मारने व देवताओं की रक्षा एवं समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने के लिए जब शिवजी किसी अघोरास्त्र की रचना पर विचार कर रहें थे।  उस समय उनके थके हुए तथा उन्मेलित नेत्रों से जल की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरी। उन  बूंदों से ही रूद्रक्ष की उत्पत्ति हुई।
रूद्राक्षाणां फलं तस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
लक्षं तत्स्पर्शने पुण्यं कोटिर्भवति मालनात्
रूद्राक्ष फल के स्पर्श मात्र से ही कई लाख गुणा पुण्य प्राप्त होता है तथा धारण रकरने पर तो कोटि-कोटि फल प्राप्त होता है।
रूद्रक्ष के प्रकार - रूद्रक्ष चार प्रकार के होते है।
1. सफेद
2. लाल
3. मिश्रित
4. काला

आकार के हिसाब से आंवले के बराबर आकार का रूद्राक्ष श्रेष्ठ माना जाता है। रूद्राक्ष में धारियां होती हैं, इन धारियों को ही मुख कहा जाता है। यह एक से लेकर चौदह मुखी तक होती हैं।
रूद्राक्ष के फल -
1.    रूद्राक्ष धारण किए मनुष्य से, शिव, विष्णु देवी गणेश, सूर्य आदि सभी देवता प्रसन्न होते हैं।
2.    रूद्राक्ष की माला द्वारा जपने से मंत्र समस्त फल देने वाले होते हैं।
3.    रूद्राक्ष के मुख से ब्रह्मा, मध्य में रूद्र तथा तल में विष्णु का निवास होता है।

एक से चौदह मुखी रूद्राक्ष के अलग-अलग कार्य होते हैं। जो इस प्रकार हैं।

एक मुखी: एक मुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव है। यह अत्यन्त दुर्लभ होता है। यह अन्य रूद्राक्षो के मुकाबले बहुत ही कम पैदा होता हैं। इसको धारण करने से सभी प्रकार के पापों का शमन होता है तथा यह धन धान्य देने वाला, रोगमुक्ति शत्रु पर विजय पाने वाला तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला होता है।
विशेष -  एक मुखी रूद्रक्ष यदि गल्ले में रखें तो कभी धन की कमी नही होगी। उसपर सदैव शिव की कृपा बनी रहेगी।

    दो मुखी: दो मुखी रूद्राक्ष अद्र्धनारीश्वर स्वरूप हैं। यह शिव तथा शक्ति का संयुक्त रूप हैं। इसे धारण करने से  तामसिक वृत्तियों का परिहार, चित्त एकाग्रता, मानसिक शांति ,आध्यात्मिक उत्थान व कुण्डलिनी जाग्रत होती हैं। यह श्रद्धा  तथा विश्वास का प्रतिक हैं।




तीन मुखी: इसको अग्नि का स्वरूप हैं।  यह सत, रज तथा तम का त्रिगुणात्मक शक्ति रूप हैं। इस रूद्राक्ष में ब्रहा, विष्णु, महेश तीनो देवो कि शक्तियों का समावेश हैं। इसको धारण करने से व्यक्ति क्रियाशील रहता है। यदि नौकरी नही लग रही हो, व्यक्ति बेकार ही बैठा हो तो यह रूद्राक्ष फायदेमंद रहता है। व्यक्ति के समस्त पापो का क्षय करता है तथा दया, धर्म, परोपकार के भाव जाग्रत करता हैं।


चार मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप है, इसमें चार वेदों का समावेश है। यह व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाला है, इस रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति आरोग्यवान, ज्ञानवान, बुद्धिवान होता है। अग्निपुराण में यहाँ तक लिखा है कि इसके प्रभाव से व्याभिचारी भी ब्रह्मचारी तथा मस्तिष्क आस्तिम हो जाता है।
विशेष:- चार वेदों के समावेश से यह विद्यार्थी व ज्योतिषविदों के लिए परम लाभदायक है।
पंचमुखी रुद्राक्ष: इसको कालाग्नि के नाम से जानते हैं, यह स्वयं रुद्र स्वरूप है, इसमें शिव के पाँचों रुप (रुधेजात, ईशान, तत्पुरुष, अधोर तथा कामदेव) विद्यमान हैं, जिससे यह पर उपयोगी हो जाता है। इसे धारण करने से हृदय स्वच्छ, मन शांत तथा दिमाग को शांति प्रदान करता है, यह शत्रुओं को परास्त, रोगों के नाश, प्रेत बाधा की समाप्ति करने में सक्षम है।
विशेष:- इसे कम से कम 3 या पाँच की संख्या में ही धारण करें।
 छ: मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष परमकल्याणकारी है। जहाँ यह एक ओर कात्र्तिकेय की शक्ति का केन्द्र बिन्दु है, वहीं दूसरी तरफ गणपति के विद्या, ज्ञान, बुद्धि का प्रतीक भी है। यह रुद्राक्ष छ: प्रकार की बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोक्ष, मोह, मद, मत्सर) को भी नष्ट करता है। इसे धारण करने पर व्यक्ति दरिद्रता, चर्म रोगों से मुक्त होकर लक्ष्मीवान हो जाता है।


सप्तमुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष सप्तऋषियों का स्वरूप है। अत: इसमें सप्त ऋषियों का आशीर्वाद (ओज, तेज, ज्ञान, बल) विद्यमान है। यदि किसी व्यक्ति के मारकेश की दशा चल रही हो या साढ़ेसाती के प्रभाव में कष्ट  पा रहा हो तो उसने अशुभ प्रभाव की शांति हेतु इसे धारण करना चाहिए। यह धन-सम्पत्ति, कीर्ति और विजय प्रदान करने में भी सक्षम है।




Thursday, 8 November 2012

क्या बदलाव लाएगें धनु के मंगल आपके जीवन में ?

नवग्रहों में प्रत्येक ग्रह को अपना-अपना कारकत्व प्राप्त होता है। जैसे सूर्य पिता, सरकारी या स्वयं का व्यवसाय, अधिकारियों के साथ सामंजस्य का कारक है। शरीर में आत्मा, हड्डी, सिर का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार मंगल छोटे भाई-बहन, मामा, ब्रण (घाव), वाद-विवाद, झगड़े, सज्जा, रक्त, पित्त, साहस, शोर्य आदि का कारक है। मंगल प्रधान व्यक्ति में मंगल के रहन-सहन गुण देखने को मिलते हैं।
                        मंगल एक ऊर्जात्मक ग्रह है, जब ये पत्रिका में किसी भी प्रकार व्यक्ति को प्रभावित करते हैं तो भूमि-भवन, कोर्ट-कचहरी, साहस, तर्क, शक्ति व  अहम आदि से संबंधित विषयों से हानि-लाभ दिलवातें हैं। यदि पत्रिका में मंगल की स्थिती व षडबल में बल भी अच्छा हो तो व्यक्ति जीवन में सफलता के नये-नये रास्ते खोजता है। वही यदि मंगल कमजोर, अस्त या शत्रु हो तो भारी कठिनाईयों का सामना करता है।
9 नवम्बर 2012 को मंगल अपनी राशि वृश्चिक से धनु राशि में गोचरवश पहुंच जाएंगे।
यहाँ ये 13 दिसम्बर तक रहेंगे। प्रत्येक राशि पर इनका अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा:-
मेष:- आपकी राशि से मंगल भाग्य भाव में गोचर करेंगे, अब तक आपको जो शारीरिक व मानसिक कष्ट हो रहा  था, अब धीरे-धीरे उसमें सुधार होने लगेगा, मंगल चूंकि आपकी राशि मेष के स्वामी हैं और नवम में गोचर कर रहे हैं। इस गोचर में जहाँ पूर्वाद्र्ध में शारीरिक कमजोरी महसूस होगी, छुट-पुट शत्रु उत्पन्न होंगे, धन की कमी सताने लगेगी, वहीं उत्तराद्र्ध में समस्त समस्याओं से छुटकारा प्राप्त होगा।
    जमीन-जायदाद से संबंधित मामलें, जो कोर्ट में चल रहे हैं या क्रय-विक्रय का विचार है, किन्तु उसकी पूर्णता पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो अब यह मामले पूर्ण होने लगेंगे। घर की आवश्यकतायें कर्ज के रूप में पूरी होगी। जीवनसाथी से चली आ रही रोक-टोक प्यार में बदलने लगेगी। यात्रा सफल रहेगी।

वृषभ:- मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा क्योंकि इस समय मंगल आपकी राशि से अष्टम भाव अर्थात् आयु भाव में गोचरवश आ गए हैं। मंगल की यह स्थिति आपकी आय के स्त्रोत को भी प्रभावित करेगी। गुदा प्रदेश के आस-पास या नेत्र से संबंधित रोग हो सकतें हैं। आयु का हृास, परेदेश-गमन, बल व पराक्रम को भी प्रभावित करेंगे। इस समय आपको चाहिये आप हनुमान जी की भरपूर सेवा करें।

मिथुन:- आपकी राशि मिथुन से गोचरवश मंगल सप्तम भाव में स्थित हैं। जन्मपत्रिका में सप्तम भाव स्त्री, साझेदारी (व्यापारिक), व्यापार आदि से संबंधित है। मंगल यहाँ स्थित होकर स्त्री से कलह, स्त्री के स्वास्थ्य संबंधी समस्या, यदि व्यापार साझेदारी का है तो साझेदारी द्वारा आर्थिक नुकसान होता है, जिसके परिणामस्वरूप  आप पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। मानसिक व शारीरिक कष्ट होता है। साथ ही स्वयं के भाइयों से शत्रुता प्रधान करेंगे, वैवाहिक सुख न के बराबर प्राप्त होगा। किन्तु मामा व संतान पक्ष से लाभ होता है।
कर्क:- आपकी राशि में मंगल छठे भाव में गोचर कर रहे हैं। अत : आपको जो संतान पक्ष की चिंता या उनके द्वारा प्रदान किये जाने वाले कष्ट, शत्रु पीड़ा, मान-प्रतिष्ठा में लगातार हो रही कमी से दुखी थे अब उनसे सबसे छुटकारा मिल ने लगेगा।
    छठा मंगल आपको अन्न, धन, बल, शत्रुओं पर विजय, यश प्राप्ति करवाता है। कार्यस्थल पर भी आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। यदि आप सर्विस करते हैं तो अधिकारी वर्ग अब आपके अनुकूल हो चलेंगे। घर, जमीन या वाहन खरीदने का योग बनेगा।

सिंह:- आपकी राशि के अनुसार मंगल पंचम भाव में गोचर कर रहे हैं। मंगल का यह गोचर आपके लिए कष्टकारी रहेगा। यदि आप व्यापार करते हैं तो हानि होगी और नौकरी करते हैं तो अधिकारी वर्ग से परेशानी आएगी। समाज में प्रतिष्ठा घटने लगेगी। संतान को कष्ट होगा। इस समय जिन्हें संतान होने की उम्मीद चली आ रही है अर्थात् प्रेगेनेन्सी कन्फर्म हो चुकी थी, उन्हें विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह गोचर उनकी संतान के लिए अत्यनत कष्टकारी है। संतान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनैतिक तरीका न अपनाए अन्यथा भारी हानि उठानी होगी।

कन्या:- आपकी की जन्मराशि से मंगल गोचरवश चतुर्थ भाव में आ गए हैं, जन्मपत्रिका का चतुर्थ भाव जमीन-जायदाद, माता, रिश्ते-नाते, सुख-सुविधा, शिक्षा आदि से संबंधित होता है। मंगल का यह गोचर चतुर्थ भाव से संबंधित प्रत्येक विषयों पर विपरीत प्रभाव डालेगा, जैसे माता को शारीरिक कष्ट, शत्रु वृद्धि, स्त्री को कष्ट, कार्यस्थल पर असफलता, आय के साधनों में कमी, ज्वर, वक्षस्थल या रक्त विकार से संबंधित रोग, शत्रु वृद्धि, स्वजनों का विरोध, स्वयं के बल व पराक्रम में कमी होगी।

तुला:- आपकी राशि से मंगल का गोचर तृतीय भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर अच्छा होता है। पत्रिका का तृतीय भाव अन्य विषयों के साथ-साथ बल व पराक्रम से संबंधित भी होता है और मंगल ऊर्जावान व पराक्रम से संबंधित ग्रह हैं।
    पिछले समय से चली आ रही समस्याएँ समाप्त होने लगेगी। आपके शत्रु जो अब तक किसी न किसी रूप में परेशान कर रहे थे, अब आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे। आप अपने अंदर एक नवीन ऊर्जा को महसूस करेंगे। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। कोर्ट-कचहरी के मामले अब आपके पक्ष में होने लगेंगे।

वृश्चिक:- आपकी राशि से मंगल द्वितीय भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का द्वितीय भाव, धन, कुटुम्ब, वाणि आदि से संबंधित होता है। मंगल चूंकि ऊर्जात्मक ग्रह हैं और धनु राशि भी अग्नि तत्व है अर्थात् ऊर्जा ऊर्जा का भयंकर प्रवाह आपकी वाणि में देखने को मिलेगा, जिसके प्रभाव से लोग आपसे दूरी बनाने लगेंगे। जहाँ द्वादश शनि साढ़े साती के द्वारा कष्ट पहुंचाना शुरु कर  चुके थे, वही मंगल आग में घी का कार्य करेंगे। यदि आप विवाहित हैं तो जीवन साथी के साथ मतभेद बढ़ेगा। आपको चाहिए की आप मंगल देव की आराधना करें।

धनु:- इस  समय मंगल का गोचर आपकी राशि पर से हो रहा है। आपकी राशि धनु तथा ग्रहों में मंगल दोनों ही ऊर्जा प्रधान ग्रह हैं, परिणामस्वरूप मन बैचेन रहेगा, वाहन से कष्ट, संतान से व संतान को कष्ट, कार्यक्षेत्र पर अधिकारी वर्ग से परेशानी, व्रण, ज्वर या रक्त विकार, जीवन साथी को कष्ट आदि परिणाम प्रापत होंगे।
यात्राओं में भारी कष्ट होता है, जमीन-जायदाद से संंबंधित मामलों में कष्ट होता है।

मकर:- आपकी जन्मराशि से मंगल गोचरवश द्वादश भाव में हो रहा है। मंगल का यह गोचर शुभ नहीं होता है। पत्रिका का प्रत्येक भाव से 12वाँ भाव उस भाव का खण्डन करता है अर्थात् द्वादश मंगल शारीरिक कष्ट, नेत्र रोग, जीवन साथी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, मान-सम्मान में कमी।
    पंचम भाव पुत्र से संबंधित होता है और पंचम से अष्टम द्वादश भाव हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संतान पक्ष को कष्ट होता है। यदि संतान किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगी हो तो सफलता नहीं मिलेगी।

कुंभ:- मंगल आपकी राशि में एकादश भाव में गोचर कर रहे हैं। पत्रिका का एकादश आय, बड़े भाई-बहन, लाभ सिद्धि, वैभव आदि विषयों से संबंधित होता है। मंगल का इस भाव से गोचर एकादश भाव से संबंधित विषयों की प्राप्ति को दर्शाता है अर्थात् समय अनुकूल होने लगता है। लाभ के साधन बढ़ते हैं। व्यापार भी बढ़ता है। भाईयों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही शत्रु परास्त होते हैं। कार्यों में सफलता मिलती है। जो अविवाहित हैं, उनके विवाह तय होते हैं। इस समय आपको वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। साथ ही  विवाहित  हैं तो संतान का ध्यान रखें, उन्हें कुछ कष्ट हो सकता है।

मीन:- जन्म पत्रिका का दशम भाव व्यवसाय, नौकरी, मान-सम्मान, ज्ञान, पिता, कर्म, कीर्ति, जय-विजय आदि से संबंधित होता है। मंगल अपनी राशि मीन से दशम में गोचर कर रहे हैं। मंगल जहाँ अपनी राशि मेश से नवम है, वही दूसरी राशि वृश्चिक से द्वितीय भी हैं।
    नवम भाव भाज्य व द्वितीय धन, कुटुम्ब से संबंधित है। मंगल इस गोचर में आपको जहाँ एक और धन प्राप्ति व भाग्य बढ़ायेंगे, वहीं दूसरी ओर आपमें एक असीम ऊर्जा भी प्रभावित करेंगे। व्यापार से लाभ होगा। भूमि-भवन से संबंधित मामले जोर पकड़ेंगे। पद-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

Friday, 26 October 2012

मांगलिक दोष या योग

    प्रत्येक दंपत्ति की चाह होती है कि उनके घर में भी बच्चे की किलकारी सुनाई दें, जिसे सुनकर मन को आत्मिक संतुष्टि प्रदान हो। बच्चे की प्रत्येक चाहत को पूरा करने के लिये व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।
    बच्चे का जन्म होने पर पंडित या ज्योतिषी यह बताता है कि बच्चे पर मंगल का दोष है अर्थात् मांगलिक है तो व्यक्ति परेशान हो जाता है कि बच्चे के विवाह में परेशानियाँ आएंगी। किसी मंगली कन्या से ही विवाह करना होगा। कई बार तो व्यक्ति बच्चे की कुण्डली ही बदलवा देते हैं, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए, आँख बंद कर लेने से रात हो गई है, ऐसा भ्रम मन में नहीं रखना चाहिए। सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि जिसे हम मंगल दोष मान रहे हैं, असल में वो दोष नहीं बल्कि योग है। मंगल ऊर्जावान ग्रह हैं और यदि ये किसी भी प्रकार लग्न, राशि, तृतीय या जिस भाव को देखते हैं, उस भाव से संबंधित विषयों पर ऊर्जा प्रवाह करते हैं, यदि लग्न में है तो व्यक्ति ऊर्जावान होगा, कभी किसी से हार नहीं मानेगा। ऐसे ही परिणाम प्रत्येक भाव में अलग-अलग मिलते हैं।

लग्न - त्रिकोण व केन्द्र हैं, जो की अत्यन्त शुभ हैं।
चतुर्थ - केन्द्र हैं जो जीवन में प्राप्त होने वाले सुखो को दर्शाता हैं।
सप्तम - केन्द्र हैं जो जीवनसाथी, साझेदारी आदि विषयो को इंगित करता हैं।
अष्टम - स्त्रीयो का सोभाग्य, आयु

द्वादश - मोक्ष स्थान हैं।

    जब मंगल ऐसे शुभ स्थानों पर होंगे तो दोष कैसे हो सकता है, मेरे अनुसार तो योग होगा, दोष इसलिए कह देते होंगे कि मांगलिक व्यक्ति में ऊर्जा इतनी होगी की साधारण व्यक्ति से उसकी तुलना नहीं की जा सकती, उसके लिये बराबर का ऊर्जावान साथी ही चाहिए।
    किसी भी व्यक्ति में ये योग हो तो हमें यह समझना चाहिए की यह व्यक्ति जीवन में कभी भी असफल नहीं होगा। यदि किसी गोचरवश या  खराब ग्रह की महादशा वश असफल हुआ तो भी सफलता के लिये संघर्ष करता हुआ मिलेगा।

Sunday, 7 October 2012

Kareena Kapoor


हिन्दी फिल्म में अभिनेत्रियों में करीना कपूर का अपना एक अलग ही मुकाम हैं, चूकिं सभी जानते है कि कपूर खानदान सदा से ही अभिनय के क्षेत्र का धनी रहा हैं। कपूर खानदान के कई लोगो को हम आज भी याद करतें हैं। जिनके अभिनय की छाप आज भी हमारी यादों मे बसती हैं।
वैसे तो कपूर खानदान से सिर्फ व्यक्ति ही अभिनय के क्षेत्र में आए, परन्तु रंधिर कपूर व अभिनेत्री बबीता कपूर ने पहली बार दो कपूर अभिनेत्रियों को अभिनय के क्षेत्र में उतारा।
1. करिश्मा कपूर
2. करीना कपूर
    चूकि हम यहाँ करीना कपूर की पत्रिका का विश्लेषण कर रहें हैं। अत: इन्ही के बारे में चर्चा करेंगे ओर देखेंगे की किस प्रकार पत्रिका में स्थित ग्रहो ने इनका रुख अभिनय के क्षेत्र की और करवायां। अब तक का इनका सफर कैसा रहा व आगें कैसा रहेगा। इसी वर्ष आने वाली इनकी 2 फिल्में क्या कमाल दिखएंगी।


D-1
D-9


इनकी पत्रिका में सूर्य नीचाभिलासी ग्रह है व अष्टम भाव के स्वामी होकर भाग्य भाव में 4:57 अंश पर स्थित हैं। साथ ही सूर्य,शनि के साथ स्थित हैं। नवमांश में भी सूर्य, शनि व राहु के साथ स्थित है।  सूर्य की यह स्थित जन्म के समय पिता के प्रसिद्धि व कार्यक्षेत्र में कमी को दर्शाती हैं।
        इनके पिता (रंधिर कपूर) ने अपने फिल्मी करियॅर की शुरुआत 1971 मे कल आज और कल से की, इस फिल्म के निर्देशक भी ये ही थे। 1971 से 1975 का दौर इनके लिए ठीक रहा, जिसमें रामपुर का लक्ष्मन, जवानी दिवानी हिट फिल्म रही। जबकि 1981 में बनी बीवी ओ बीवी, हरजाई, जमाने को दिखाना, कोई कमाल न दिखा पाई।

व्यक्तित्व - करीना कपूर की जन्म राशि मकर हैं ये स्वभाव से धीर, गंभीर, परोपकारी हैं।  पृथ्वी सभी को धारण कर धीरे-धीरे अपनी धुरी पर घूमती है, तथा एक निर्धारित समय में अपनी परिक्रमा पूरी करती है। ठीक इसी प्रकार का गुण करीन मे विद्यमान हैं, मकर राशि होने के कारण ये सदैव धैर्य के साथ  धीरे-धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए उसको पूरा करके ही छोड़ती हैं। लक्ष्य चाहे चट्टान की भांति कठोर ही क्यों न हो, यह शांत रहकर दृढ़ इच्छा व आत्म विश्वास के साथ उसे पाने के लिए जुटी रहती हैं। फिल्म चमेली इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
इस राशि के स्वामी शनिदेव हैं जो शनैश्चर भी कहे  जाते हैं। शनै: + चर यानि धीरे चलने वाले।
करीना अनुशासन प्रिय हैं तथा तर्क देने में भी निपुर्ण  हैं, अनुशासन के विरुद्ध जाने पर व्यक्ति को दण्ड देने से भी नहीं चूकती हैं।
मकर राशि का चिह्न 'जलमृग' है। फलत: करीना कपूर के स्वभाव में मृग सी चंचलता व सौम्यता हमें देखने को मिलती है।
करीना कपूर का जन्म  नक्षत्र श्रवण हैं, जिसके चारो चरण मकर राशि में आते हैं। इस नक्षत्र के स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं अत: इस नक्षत्र पर शनि एवं चंद्रमा का सम्मिलित प्रभाव रहता है। श्रवण का अर्थ है - सुनना । इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति सुनने के महत्व को समझते हैं तथा गंभीर ज्ञानी होते हैं। सुनकर सीखने की लालसा भी सदैव बनी रहती है। इनका ध्यान संगीत, कला व अधिकाधिक ज्ञान पाने की ओर ही सदैव लगा रहता है। यही कारण हैं कि इनका रुझान फिल्मों कि तरफ हुआ।
चंद्रमा अभिव्यक्ति देते हैं व शनि एकाग्रता। चंद्रमा की अभिव्यक्ति, शनि की एकाग्रता से मिलकर ज्ञान का विस्तार वाक् चातुर्य के साथ होता है। परिणामस्वरूप ये सभी के साथ मित्र  व्यवहार रखती हैं।
इस नक्षत्र के स्वामी देवता सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु हैं । ये पूर्णत: सजग मस्तिष्क के तथा नियंत्रित स्वभाव वाली हैं। इनमें अधीरता नाम मात्र की भी नही हैं।
करीना सरलता, सौम्यता व कठोरता का मिला-जुला रूप हैं परन्तु सुनने के गुण के कारण ही कई बार अर्थहीन एवं बुरी सलाहों में भी फँस जाती हैं, जिसका बुरा प्रभाव इनके व्यक्तित्व पर पडता हैं।
महादशा:-
1. करीना के जन्म के समय चन्द्रमा में शुक्र की दशा चल रही थी, महादशानाथ चन्द्रमा शनि क्षेत्री हैं व अन्तर्रदशानाथ शुक्र की राहु के साथ युति हो रही हैं। पाराशरी पद्धति के अनुसार महा दशा व अन्तर्रदशा सम-सप्तक हो तो वह दशा परम कष्टदायक होती है। करीना को सुखेश मंगल की दृष्टि व सप्तमेश चन्द्रमा के कारण तो सभी का प्यार मिला, किन्तु पारिवारिक स्थिति कमजोर ही रही।

2. मंगल की महादशा चन्द्रमा की अपेक्षा अच्छी रही, किन्तु मंगल में सूर्य में विशेष कष्ट देखने को मिले,। इसी दौरान 17-12-87 से 14-12-90 तक शनि की साढ़ेसाती के प्रथम पक्ष ने भी कष्टों को और बढ़ाया, परिणाम स्वरुप पारिवारिक मतभेद बढऩे लगे, जिसके कारण इन्हें कपूर खानदान से अलग होना पडा।

3. कर्क के राहू की दशा 7-9-88 को शुरु हुई, राहु में गुरु 21-5-91 को शुरु हुए, तब पारिवारिक स्थिति में सुधार हुआ, पत्रिका के अनुसार राहु में गुरु में स्वयं का घर, सवारी, मोटरगाड़ी, सम्मान आदि प्राप्त होता है, यह वही वर्ष है, जब करिश्मा ने अपने कयिर की शुरुआत की व पिता की हिना फिल्म हिट हुई, जिसके निर्माता व निर्देशक रंधिर कपूर न ही थे।

4. राहु में शुक्र की दशा में शुक्र पत्रिका से दशमेश व पंचमेश होकर सप्तम भाव में राहु के साथ स्थित हैं, और षड्बल में भी बलवान हैं, राहु के साथ होने के कारण ''कहो न प्यार है'' में कार्य नहीं कर पाई और रिफ्यूजी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गई, किन्तु शुक्र ने इन्हें नवोदित कलाकार का पुरस्कार अवश्य दिलवाया। सप्तम भाव साझेदारी का भाव भी होता हैं, इस दशा में ही ''कभी खुशी कभी कम'' रिलीज हुई, जिसने 490 करोड़ का बिजनेस किया व इनके कार्य को लोगों ने सराहा। क्योंकि इसमें करीना के अलावा अन्य कलाकार भी थे।
जिवन में नया मोड -
    राहु की दशा कुल मिलाकर बढिय़ा साबित हुई, राहु - चन्द्रमा में हुई रिलीज हुई फिल्म ''चमेली'' ने इस फिल्म में विशेष प्रदर्शन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार ( Film Fare Award for Speical Performance )  व फिल्म ''देव (DEV)'' ने भी अच्छी अभिनेत्री ( Best Actress ) का पुरस्कार दिलाया।

जिवन साथी -
    काफी समय तक मीडिया में शाहिद कपूर के साथ इनके किस्से छाए रहें। स्त्री की पत्रिका में गुरु पति के कारक होते हैं जोकि इनकी पत्रिका अष्टम भाव में स्थित होकर अस्त हैं।  लगभग गुरु व गुरु में केतु की दशा में इनके बीच मतभेद बढ़े। अष्टमस्थ गुरु व लग्न में स्थित केतु के कारण ऐसा हुआ।  इसके बाद गुरु में शुक्र की दशा 25-09-2007 से 01-02-2008 में बीच रही जब सैफ अली खान इनके जीवन में आए व इन्होंने मीडिया के सामने अपने को As a Lovers मान भी लिया।
    करीना कपूर की पत्रिका में पंचमेश व सप्तमेश की पूर्ण दृष्टि लग्न व नवांश पर होने से इनके प्रेमविवाह  को दर्शाती है।

आगामी आने वाली इनकी फिल्म कैसी रहेंगी -
    शनि लग्नेश होकर अस्त हैं, पाराशरीय ज्योतिष के अनुसार अस्त ग्रहों की दशा में लाभ प्राप्त न के बराबर ही होता है। इनके गुरु व शनि दोनों अस्त हैं और गुरु-शनि में शनि की दशा 25-10-2008  20-03-2009 तक रही। इस दौरान रिलीज हुई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल न कर पाई।

हीरोइन -     करीना की सितम्बर-2012 में रिलीज होने वाली फिल्म ''हीरोइन'' बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई। क्योंकि इनकी पत्रिका में गुरु अस्त हैं व द्वादश व तृतीय भाव के स्वामी होकर अष्टम भाव में स्थित हैं।
    ''हीरोइन'' के रिलीज के समय भी दोनो अस्त ग्रहो की दशा-अन्तर्दशा थी। अत: ये फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल न कर पाई।

आगामी फिल्म तलाश - यह फिल्म लोकप्रिय रहेगी व कैरियर में मील का पत्थर साबित होगा। यदि यह फिल्म 27-11-12 से 07-12-2012 के बीच रिलीज होती हैं तब, अगर ये 27 से पहले रिलीज हुई तो हिट होना मुश्किल रहेगा।
    जीवन में सदैव आगे बढ़ते रहने व जीवनसाथी व स्वयं के बीच सामंजस्य स्थापित बनाये रखने के लिए गुरु व शनि के उपाय करते रहने चाहिए। साथ ही गणेश जी के प्रति विश्वास बनाए रखना चाहिए।
   

Tuesday, 7 August 2012

इस बार है - जयंती जनमाष्टमी


भगवान श्रीकृष्ण का जन्म क्यो व किस कारण हुआ तथा किस प्रकार उन्होनें कंश व कंश द्वारा भेजे हुए राक्षसों का वध किया ये सभी जानते है।
            भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथी जोकि रोहिणी नक्षत्र युक्त थी को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जिस दिन भगवान कृष्णा का जन्म हुआ उस दिन को हम जन्माष्टमी के रुप में मनाते है।
चुकिं इस दिन रोहिणी नक्षत्र था अत: जब जन्माष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र हो तो वह च्च्जयंतीज्ज् अन्यथा च्च्केवलाज्ज् कहलाती हैं।
जयंती जन्माष्टमी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है। यदि इस दिन सोमवार या बुधवार पडे तो पुण्यफल में और भी वृद्धि होजाती है।
यदि जयंती जन्माष्टमी सोमवार या बुधवार को हो और साथ में गोचर में चन्द्र-बुध की युती हो तो अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती हैं। ये हजार अश्वमेघयज्ञ का फल प्रदान करने वाली, जन्म जन्मांतर के पापों को हरने वाली होती है। किन्तु ऐसा योग वर्षों में बाद कभी-कभी ही आता हैं।