Friday, 18 December 2015

जैमिनी ज्योतिष

जैमिनी पद्धति के अनुसार व्यवसाय चयन हेतु कारकांश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (कारकांश आत्म कारक का नवमांश है) यदि कारकांश या उससे दसवां किसी ग्रह से युक्त न हो तो कारकांश से दशमेश की नवमांश में स्थिति से व्यवसाय ज्ञात किया जाता है।
1) कारकांश में सूर्य राजकीय सेवा देता है और राजनैतिक नेतृत्व देता है।
2) पूर्ण चंद्र व शुक्र कारकांश में लेखक व उपदेशक बनाता है।
3) कारकांश में बुध व्यापारी तथा कलाकार का योग प्रदान करता है।
4) बृहस्पति कारकांश में जातक को धार्मिक विषयों का गूढ़ विद्वान व दार्शनिक बनाता है।
5) कारकांश में शुक्र जातक को सरकारी अधिकारी शासक व लेखक बनाता है।
6) कारकांश में शनि जातक को विख्यात व्यापारी बनाता है।
7) कारकांश यदि राहु हो तो मशीन निर्माण कार्य, ठगी का कार्य करने वाला जातक को बना देता है।
8) कारकांश का केतु से संबंध हो तो जातक नीच कर्म तथा धोखाधड़ी से आजीविका कमाता है।
9) कारकांश यदि गुलिक की राशि हो और चंद्र से दृष्ट हो तो व्यक्ति अपने त्यागपूर्ण व्यवहार से और धार्मिक कार्यों से जीविका अर्जित करेगा।
10) कारकांश में यदि केतु हो और शुक्र से दृष्ट हो तो धार्मिक कार्यों से आजीविका अर्जित करेगा।
11) कारकांश यदि सूर्य व शुक्र द्वारा दृष्ट हो तो जातक राजा का कर्मचारी बनता है।
12) कारकांश से तीसरे और छठे में क्रूर ग्रह हों तो जातक खेती व बागवानी का कार्य करता है।
13) कारकांश में चंद्र हो और शुक्र से दृष्ट हो तो वह रसायन विज्ञान द्वारा आजीविका अर्जित करता है।
14) कारकांश में चंद्र यदि बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक डॉक्टर होता है।
15) कारकांश में शनि हो या उससे चौथे में हो तो जातक अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण होता है।
16) कारकांश से चौथे में सूर्य या मंगल शस्त्रों से जीविका प्रदान करता है।
17) कारकांश से पांचवें या लग्न में चंद्र व गुरु जातक को लेखनी द्वारा जीविका अर्जन प्रदान करते हैं।
18) कारकांश में पांचवें व सातवें में गुरु हो तो व्यक्ति सरकारी उच्च अधिकारी होता है।
19) कारकांश में यदि शनि हो तो जातक पैतृक व्यवसाय करता है।
20) कारकांश लग्न या उससे पंचम स्थान में अकेला केतु हो तो मनुष्य ज्योतिषी गणितज्ञ, कंप्यूटर विशेषज्ञ होता है।
21) कारकांश लग्न से पंचम में राहु हो तो जातक एक अच्छा मैकेनिक होता है।
22)यदि नवांश में राहु आत्मकारक के साथ हो तो जातक चोरी, डकैती से आजीविका चलाता है।
23) कारकांश लग्न से शनि चतुर्थ या पंचम हो तो जातक निशानेबाज होता है और यही आजीविका का साधन भी हो सकता है।
24) कारकांश से पंचम में शुक्र हो तो जातक को कविता करने का शौक होता है।
25) कारकांश से पंचम में यदि गुरु हो तो जातक वेदों और उपनिषेदों का जानकार और विद्वान होता है तथा यही जातक की आजीविका का साधन भी होता है।
26) कारकांश से पंचम में यदि सूर्य हो तो जातक दार्शनिक तथा संगीतज्ञ होता है।

रामायण का नाम वाल्मीकि जी ने राम चरित मानस क्यों रखा ?

तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की, तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा!आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है,वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?

बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो एक समय पर जाना होता है,मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.

और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.

इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"
राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal)में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical)
राम
चरित
मानस

किसी ने गोस्वामी जी से पूंछा आपने खड़े में क्यों लिखा तो गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस राम दर्शन की ,राम मिलन की सीढी है ,जिस प्रकार हम घर में कलर कराते है तो एक लकड़ी की सीढी लगाते है ,जिसे हमारे यहाँ नसेनी कहते है,जिसमे डंडे लगे होते है,गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस भी राम मिलन की सीढी है जिसके प्रथम डंडे पर पैर रखते ही श्रीराम चन्द्र जी के दर्शन होने लगते है,अर्थात यदि कोई बाल काण्ड ही पढ़ ले, तो उसे राम जी का दर्शन हो जायेगा.

Thursday, 8 May 2014

व्यक्ति भी होता हैं मोबाईल की तरह रिचार्ज

जिस प्रकार मोबाइल को निरंतर उपयोग में लेने के लिए उसे चार्ज करना जरुरी होता हैं। ठीक उसी प्रकार व्यक्ति भी अपने कार्यों को निष्पादन निरंतर करता रहें। इसके लिए उसे उर्जा की आवश्यकता होती हैं। वास्तुशास्त्र में ऐसे कई रहस्य वर्णित हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक हैं। दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम दिशा में शयनकक्ष का विधान।

आज जब वास्तु का प्रचलन बढ रहा हैं तो व्यक्तियों को वास्तु के सामान्य नियमों का ज्ञान हो चला हैं। जैसें:- किचन अग्निकोण में होना चाहिए ,शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यहाँ उनका चह मानना तो सही हैं कि किचन अग्निकोण में या शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए परन्तु

1. एक तो इस बात का कि अग्निकोण या दक्षिण दिशा उनके भुखण्ड में है भी या नही यदि हैं तो वह कहाँ हैं इसका पता उन्हें नही होता हैं। वे अपने भूखण्ड में ही समस्त दिशाएं स्थित हैं ऐसा मानते रहें हैं। जबकि वास्तव में ऐसा नही होता हैं। हमारी पृथ्वी का झुकाव 23.5 Degree का हैं। अर्थात व्यक्ति जो दिशाओ को 0 Degree  मानकर आकलन करता हैं।

2. दूसरा इन नियमों के सैधांतिक पक्ष का पता उन्हें नही होता कि अग्निकोण किचन के लिए या शयनकक्ष दक्षिण दिशा में ही क्यों? प्रतावित हैं।


चित्र-A में नवग्रहो कि दिशाएं बताई गई हैं जिसके अनुसार उर्जा कारक ग्रह मंगल दक्षिण दिशा कि स्वामी हैं। मंगल ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में सेनापती कहा गया हैं। सेनापति वह जोकि सम्पूर्ण सेना का नैतृत्व करता हैं। जो सम्पूर्ण सेना का नैतृत्व करे उसमें कितनी उर्जा होगी हम इसमा अंदाजा लगा सकतें हैं साथ ही उसकी बात सेना का प्रत्येक व्यक्ति मानता हैं अर्थात मंगल Commanding Power भी देता हैं। घर का मुखिया भी सेनापति कि तरह ही परिवार में कार्य करता हैं। परिवार कर प्रत्येक सदस्य उसका कहना मानें व समाज में उसका प्रभुत्व बढे इसके लिए उसे मंगल कि उर्जा कि आवश्यक्ता पडती हैं। 


चित्र-B के अनुसार प्रात:काल जब सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं तो सूर्य कि Solar Energy ईशानकोण से भूखण्ड में प्रवेश करती हैं जो कि सूर्य के साथ-साथ  नैऋृत्यकोण तक जाती हैं। सूर्य पश्चिम दिशा में अस्त होतें हैं अत: Solar Energy नैऋृत्यकोण तक ही रहती हैं। यह Solar Energy जिसे भूखण्ड ने दिनभर संचित किया था। वह रात भर व्यक्ति को बैटरी कि तरह चार्ज करती हैं यदि यहाँ शयनकक्ष हुआ तो अन्यथा व्यक्ति चार्ज होने से वंचित रह जाएगा।

इस Solar Energy को संचित करने कि लिए ही दक्षिण व पश्चिम दिशा में भारी निमार्ण का विधान वास्तु से संबंधित शास्त्रों में दिया गया हैं। साथ ही यह भी वर्णित हैं कि यदि इन दिशाओं में सूई की नोक के बराबर छिद्र भी हुआ तो घर में Negative Energy प्रवेश कर जाती हैं।

यहाँ ऋषीयों ने व्यक्ति को शयनकक्ष हेतू बाध्य करने के लिए Negative Energy के प्रवेश का उल्लेख किया हैं। हमारे ऋषीमुनि खगोल के ज्ञाता थें। वे जानते थे कि यदि इन दिशाओं में छिद्र हुआ तो सूर्य से प्राप्त Solar Energy संचित नही हो पाएगी वह छिद्र के माध्यम से बाहर चली जाएगी और व्यक्ति चार्ज होने से वंचित रह जाएगा।

सारांश - मंगल ग्रह की उर्जा व सूर्य की Solar Energy जो व्यक्ति ग्रहण करता हैं। दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम दिशा में शयनकक्ष बनवाकर। वह व्यक्ति निरंतर उन्नति को प्राप्त करता हैं। परिवार के लोगों में तालमेंल, समाज में अपनी प्रतिष्ठा, प्रभूत्व या कार्यक्षेत्र में विकास करने में समर्थ रहता हैं।

Monday, 21 April 2014

कौन बनेगा भारत का प्रधानमंत्री ?

आज देश में जब लोकसभा के चुनाव हो रहें हैं तो लोगो कि नजर यह देखने में लगी हैं कि इस बार कौन होगा भारत का प्रधानमंत्री। अटकले लगाने का बाजार गर्म हैं।
            यदि हम पार्टियो कि बात करें तो प्रत्येक पार्टी अपने अपने नेता के जितने कि बात कर रही हैं। सभी नैताओ कि पास अलग-अलग किन्तु मजबुत मुद्दें हैं। यदि हम आप पार्टी कि बात करे तो ऐसा नेता मिलता हैं जिसने कुर्सी कि परवाह किये बिना लोगो कि बारे में ही सोचा। यहाँ यह भी माना जा रहा हैं कि आप के मुख्य नेता अरविन्द केजरीवाल शायद अपने किये गए वादो को पूरा करने में स्वयं ही असमर्थ थे सो उन्होनें अपने पद से स्तीफा दे दिया। वास्तविक्ता का जबकि पता ही नही हैं किसी को कि क्या सही हैं। किन्तु ये तो माना ही होगा कि उन्होने हो मुद्दे उठाए वह आम आदमी के हित के लिए ही थे।
            ठीक दूसरी तरफ काग्रेंस ने जो विकास पिछलें 10 वर्षों में देश में किये उन्हे भी नजर अंदाज नही किया जा सकता हैं मैट्रों, फ्लाईओवर, एयरपोर्ट, मोबाइल में 2जी, 3जी और अब 4जी सराहनीय कार्य रहें हैं। किन्तु साथ ही कई ऐसे भी कार्य रहें जो अत्यंत दु:खदायी रहैं। खैर overall इनके पास भी दमदार मुद्दा हैं प्रधानमंत्री बनने का।
            अब हम बात करतें हैं बीजेपी की पिछले विधानसभा चुनाव में दमदार जीत हासिल करने वाली पार्टी बीजेपी ने भी सदैव विपक्ष में रहकर अहम भुमिका निभाई हैं। आजादी के बाद बहुत कम ही अवासर इस पार्टी को देश की कमान संभलने का मिला। वर्तमान में बीजेपी के मुख्य नेता नरेन्द्र मोदी जिन्होनें गुजरात का नाम देश में ही नही विदेशो में भी फैलाया हैं। अब वे उसी विकास को सम्पूर्ण भारत में भी करना चाहते हैं। कई आलोचनात्मक कार्य भी गुजरात में इनके शासन काल में रहें हैं। अटकलो के बाजार में नरेन्द्र मोदी को लगभग देश का प्रधानमंत्री मान भी लिया गया हैं। मिडिया भी इस बात को हवा दे रही हैं। सभी विपक्ष की पार्टी को इस बात का एहसास भी शायद हैं।
आइये हम जाने कि ज्योतिष गणना के अनुसान भारत के प्रधानमंत्री बनने कि उम्मीद किस नेता कि ज्यादा हैं।
1. अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी)- केजरीवाल कि पत्रिका वृषभ लग्न कि हैं। चंद्रलग्न भी वृषभ ही हैं।
Arvind Kejriwal Horoscope
वृषभ राशि वाले व्यक्ति सदैव लोगो का भला करते हुए पाए जातें हैं। अपने बुते से बाहर जाकर कार्य करना कई बार उन्हे नुकसान दे जाता हैं। केजरीवाल की पत्रिका में शनि वक्री होकर द्वादश भी में नीच राशि में होकर स्थित हैं। शनि का नीचभंग भी नही हो रहा हैं। 7 नवम्बर से गोचर के वक्री गुरु ने इन्हे दिल्ली विधानसभा में जीत दिलवाई। 28 दिसम्बर 2013 से 14 फरवरी 2014 तक ये दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। वक्री गुरु मे ही पद का त्याग भी कर दिया। यदि वर्षकुण्डली का अध्ययन करे तो वर्षेश सूर्य हैं और मुथा कुभं की हैं जिसके स्वामी शनि हैं। मुंथा भाव पंचम हैं। मंगल भी नीच के  Natal horoscope में स्थित हैं। पत्रिका का दशम भाव जहाँ रोजगार से संबंधित होता हैं वही सम्मान प्राप्ति व अप्राप्ति को भी दर्शाता हैं। नवम व दशमभाव के स्वामी ग्रह शनि की द्वादश भाव में वक्री होकर स्थित हैं। गोचर में भी चल रहें वक्री शनि अब सम्मान को क्षति पहुचाने लगेगें। जिस प्राकार अरविंद केजरीवाल का नाम चढा था उसी प्रकार अब उतरने भी लगेगा।
            दिसम्बर 2013 में जहॉ आप पार्टी को लोग एक शसक्त पार्टी मानने लगें थे अब वे ही नकारने लगेंगें। मुख्यमंत्री पद के हिसाब से इन दिनो इनकी पत्रिका कमजोर हो चली हैं। सप्तमेंश मंगल जो कि गोचर में 2 मार्च से वक्री चल रहें हैं। वे अपने ही दल के लोगो में अलगाव को बढाऐगें। परिणाम हम इन दिनो देख ही रहें हैं।

2. राहुल गाँधी (कांग्रेस पार्टी)-  राहुल गाँधी की पत्रिका मकर लग्न की हैं तथा इनकी राशि वृश्चिक हैं। वृश्चिक में
Rahul Gandhi Horoscope
स्थित चंद्रमा नीच के होतें हैं। चन्द्रमॉ का नीचभंग भी नही हो रहा हैं साथ ही चतुर्थ भाव में शनि भी अपनी नीच राशि मेंष में होकर स्थित हैं। किन्तु यहाँ शनि का नीचभंग हो रहा हैं। इस समय इनकी पत्रिका में चंद्रका में मंगल की दशा चल रही हैं। दोनो ही ग्रह (चंद्रमा व मंगल) पत्रिका में एक दूसरे से छठे व आठवे होकर स्थित हैं। अत: यह दशा षडाष्टक ग्रहों कि दशा कहलाती हैं। षडाष्टक ग्रह की दशा शुभ परिणाम नही देती हैं साथ ही शनि भी इस समय गोचर में इनकी राशि वृश्चिक से द्वादश भाव में चल रहे हैं हो कि साढेसाती के रुप में पीडित कर रहें हैं। मंगल जो कि एक उर्जात्मक ग्रह हैं वे इनकी पत्रिका में अस्त भी हैं। अस्त ग्रह कि दशा शुभ परिणाम देने में असमर्थ होती हैं। यहॉ हम ऐसे व्यक्ति कि कल्पना कर समते हैं हो देना तो कुछ चाहतें हैं किन्तु स्वयं के जले शरीर के कारण स्वयं ही पीडित हैं। ज्योतिष में एक नियम हैं कि यदि कोई ग्रह जब अस्त् होता हैं तो उस ग्रह के शुभ-अशुभ परिणाम सुर्य देते हैं। क्योकि ग्रह सूर्य के सानिद्धय में ही अस्त होते हैं। यहाँ यदि हम सूर्य से शुभ परिणाम प्राप्ति कि बात करें तो सूर्य भी 3.33 अंश पर स्थित हैं। जो कि लगभग राशिसंधि के पास हैं। अत: सूर्य इनके लिए favorable रुप से कार्य करने में असमर्थ हैं। गुरु भी जून तक मिथुन राशि में ही रहेगें जो कि इनकी चंद्रकुण्डली से अष्टम भाव में स्थित हैं। अत: गुरु भी शुभ फल प्रदान करने में असमर्थ से प्रतित हो रहें हैं।
            अब हम इनकी वर्ष कुण्डली का अध्ययन भी कर लेते हैं। 18 जुन 2013 को निर्मित वर्षकुण्डली मकर लग्न की हैं। इसमें वर्षेश शनि व मुथां सिंह कि हैं जो कि अष्टम भाव में स्थित हैं। अर्थात मुथां भाव अष्टम हैं। वर्षेश शनि कार्यो में सफलता धीरे-धीरे प्रदान करेगें। इस वर्ष शनि के प्रभाव से व्यक्ति किसी पर भी पूर्णरुप से विश्वास नही करे पाऐगें। शनि कि प्रभाव के कारण योजनाए बनाने में व्यवहारिक व दर्शानिक दृष्टिकोण तो अपनाते हैं किन्तु सफलता का स्तर घटता रहता हैं। जिसका आभास व्यक्ति को होने भी लगता हैं।
अष्टम भाव की मुथां इस वर्ष पद, स्वास्थ्य,सम्मान, पारिवारिक रिश्तो व प्रतिष्ठा आदि विषयों से हानि प्रदान कर सकती हैं। इस समय व्यक्ति को अत्यधिक संधर्ष अपने आप को व अपके पक्ष को बनाएं रखने के लिा करने पडते हैं। सफलता प्राप्त न होने पर धार्मिक प्रवृति का त्याग तक करने कि सोचने लगता हैं। ऐसा यदि करता हैं तो आगे चलकर ओर भी नुकसान दायक रहता हैं। अष्टम भाव की मुंथा व वर्षेश शनि होने पर धर्म-कर्म में समय देना हितकर रहता हैं। Overall  प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रुप में यह पत्रिका भी दमदार प्रतीत नही हो रही हैं।

3. नरेन्द्र मोदी (भाजपा पार्टी)-  तुला लग्न की जन्मपत्रिका नरेन्द्र मोदी की हैं। मंगल लग्न में ही विराजमान हैं। बुध
Narendra Modi Horoscope
उच्च के वक्री होकर द्वादश भाव में स्थित हैं। चन्द्र राशि मिथुन हैं। इनकी जन्म पत्रिका में लग्र के स्थित मंगल इन्हे उर्जावान व अविश्वनिय निर्णय लेने वाला बनातें हैं। लग्न में स्थित मंगल व्यक्ति को साहसी, आत्मविश्वासी व उच्चकोटि का कार्य करने मे सक्षम बनाते हैं। मंगल के प्रभाव में व्यक्ति selfdisicion लेने वाला होता हैं जिसके  कई बार खामियाजा भी अठाना पडता हैं।
ज्योतिष जगत में शुक्र व मंगल के combination के प्रभाव वाले व्यक्ति अपने कार्यो को कलात्मक तरीके से स्पष्टता पूर्वक करता हैं। जिसकी छाप लोगो के दिलो पर लम्बे समय तक बनी रहती हैं। नरेन्द्र मोदी कि जन्मपत्रिका में लग्न मे ंमंगल तुला राशि में स्थित हैं जिसपर शनि सूर्य युक्त शुक्र कि दृष्टि द्वारा व नावांश कुण्डली में शुक्र व मंगल एक दूसरे के नावांश में स्थित होकर शुक्र व मंगल के संयुक्त गुणों का प्रभाव इनपर दर्शा रहे हैं। इनकी जन्म पत्रिका में दशम भाव के स्वामी चंद्रमा नवम भाव में स्थित हैं हो कि एक राजयोग हैं साथ ही अस समय लग्नेश शुक्र में दशमेंश चंद्रमा की दशा भी चल रही हैं। गुरु भी इस समय पत्रिका के नवम भाव व चंद्रराशि से गोचर कर रहें हैं। जो कि इनमें आत्मविश्वास व कार्यो में सफलता को दर्शा रहे हैं। इन दिनो जो मोदी कि लहर कहा जा रही हैं वह शुक्र-चंद्र कि दशा व गुरु की देन हैं। 16 जुन 2013 से 14 फरवरी 2015 तक यह दशा रहेगी जो इनके प्रधानमंत्री होने का पुखता प्रमाण दे रही हैं।
            अब हम इनकी वर्ष कुण्डली पर भी एक नजर डाल लेते हैं कि क्या वर्ष कुण्डली भी इनके प्रधानमंत्री होने का प्रमाण दे रही हैं या नही?
अक्टुबर 2001 में जब से गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय इनकी वर्ष कुण्डली में वर्षेश सूर्य व मुंथा मकर राशि कि थी। इस वर्ष भी सितम्बर 2013 में निर्मित इनकी वर्ष कुण्डली में वर्षेश सूर्य व मुंथा मकर की ही हैं। अर्थात वर्ष कुण्डली भी प्रधानमंत्री पद का प्रमाण दे रही हैं।
इतने शुभ योगो के बाद भी एक बात ध्यान देने वाली हैं कि इनकी पत्रिका में राजयोगकारक चंद्रमा केन्द्रुम योग का  निर्माण कर रहे हैं। ज्योतिष में राजयोग भंगध्याय में लिखा है कि यदि चंद्रमा षडबल में कमजोर हो, अस्त , नीचराशि, शत्रुक्षेत्री, केन्द्रुम योग में व कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथी के पश्चात व शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथी के पूर्व का चंद्रमा (पक्षबल हीन) हो तो समस्त राजयोग भंग हो जाते हैं।


तीनो पत्रिकाओ का निष्कर्ष - प्रधानमंत्री पद पर तो नरेंद्र मोदी ही होगें किन्तु पूर्णबहुमत से सरकार बनाने में संदेह हैं।

Monday, 24 February 2014

गौमुखी व सिंहमुखी भूखण्ड की भ्रांतियाँ

एक बार एक सज्जन से कुछ लोगो को मेंने कहते हुए सुना की निवास हेतु गोमुखी व व्यापार हेतु सिंहमुखी भूखण्ड शुभ होते हैं। उन दिनो में वास्तु कि प्रेक्टिस किया करता था। कोतुहलवश मेने उन लोगो से इसका कारण पुछा तो उन्होंने बताया कि गोमुखी भुखण्ड का आगें का भाग पीछे कि तुलना मे छोटा होता हैं। चित्र ए के अनुसार फलत: घर खर्च मे कमी आती हैं साथ ही यहाँ निवास करने वाला व्यक्ति मितव्ययी नही होता हैं। सिंहमुखी भुखण्ड में आगें का भाग पीछे की तुलना में बडा होता हैं। चित्र बी के अनुसार फलत: व्यापार करने पर लोगो की आवक बनी रहती हैं। लाभ बढता हैं।

                         
यह बात मेंरी समझ में नही आई कि जब ओर तो गोमुखी भुखण्ड में रहने पर खर्चे घटते हैं वही इसके विपरीत सिंहमुखी भुखण्ड में निवास करने वाले व्यक्ति को तो मितव्ययी होना चाहिये। परिणाम स्वरूप लाभ कि जगह हानि होनी चाहिए।

हम सभी जानते हैं कि वास्तुपूरुष कि कल्पना वर्गाकार रूप में कि जाती हैं। साथ ही सम्पूर्ण भूखण्ड में इनकी सत्ता व्याप्त होती हैं। यही कारण भी हैं कि भूखण्डो के आकार में शुभता की श्रेणी में पहला स्थान वर्गाकार भुखण्ड का ही हैं (वर्गाकार  भुखण्ड शुभ होते हैं या नही आज के परिपेक्ष में इसकी चर्चा हम अगले किसी भाग में करेंगें)।

                            
चित्र ए1 अनुसार गोमुखी भुखण्ड या चित्र बी1 के अनुसार सिहंमुखी भूखण्ड में हम जब वास्तुपूरुष की कल्पना करेगें तो किन्ही दो कोणो का कटान व दो कोणो का विस्तार देखने को मिलेगा। भूखण्ड के किसी भी कोण का विस्तार व कटान हानि व कष्टो को बढाने वाला होता हैं। केवल ईशान कोण का विस्तार व भी अपेक्षित मात्रा में लाभ को बढाने वाला होता हैं।
                           
मान लिजिए कि कोई उत्तरमुखी गोमुखी भूखण्ड हैं। इस स्थिती में चित्र ए1 के अनुसार भूखण्ड का वायव्य कोण व ईशान कोण कट जाऐगें व साथ ही नैऋ त्य कोण व अग्रिकोण बढ जाऐगें। 

ईशान कोण में वास्तुपुरुष का सिर होता हैं। यदि भुखण्ड में वास्तुपुरुष का सिर ही नही होगा तों वहाँ निवास करने वाले व्यक्ति कभी भी सफलता अर्जित नही  कर पाऐगें। कभी किसी भी बात पर एक मत नही होगें। पुत्र पिता से व पत्नी अपने पति की बातो का विरोध करते हुए मिलेगें। गृहस्वामी हमेशा इस बात से पीडित रहेगा की कोइ्र्र उसकी बात नही मानते हैं। अनिर्णय, प्रसिद्धी का नाश, गृहस्वामी की संतान का अलग से घर बसा लेना की प्रवृति धीरे-धीरे घर को पतन की ओर ले जाती हैं। अग्रिकोण का विस्तार भी हानि देता हैं। अल्पपुत्रता, डिहाईड्रेशन, किडनी फेल व औद्योगिक पतन आदि। बढी हुई अग्रि की तीव्रता वहा निवास करने वाले व्यक्ति के स्वभाव में देखने को मिलती हैं। जो एक दिन पतन का कारण बनती हैं।

ठीक दूसरी तरफ वायव्यकोण का कटान हो रहा हैं। वायव्यकोण के देवता राहु  व वायव्यकोण से ठीक पश्चिम दिशा मध्य के बीच का चंद्रमा का स्थान हैं। साथ ही वायव्यकोण में रोग नाम के देवता का स्थान हैं। फलत: पागलपन, डिप्रेशन, दूषित विचारधारा, वायुजनित रोग, संक्रमण आदि परिणाम धीरे-धीरे गृहस्वामी या वहाँ निवास कर रहें लोगो को सताने लगती हैं।

नैऋत्यकोण का विस्तार भी हो रहा हैं इस भूखण्ड में हो रहा हैं। नैऋत्यकोण का विस्तार यदि पश्चिम दिशा से हो रहो हो तो कानूनी विवाद, दुर्घटनाएं, संतान का किसी भी क्षेत्र में सफल न होना, संस्था में वित्तिय घाटा आदि परिणाम प्राप्त होतें हैं। कोई भी संस्था यदि ऐसे भूखण्ड पर चल सफलता पूर्वक चल रही हो तो भी यह समझना चाहिये कि अगले कुछ वर्षो में उस संस्था का पतन निश्चित हैं।

अत: सिंहमुखी व गोमुखी दोनो ही प्रकार के भूखण्ड वास्तु के दृष्टिकोण से शुभ नही होतें हैं।

Sunday, 9 February 2014

विभिन्न राशियों पर कुंभ के सूर्य का प्रभाव

13 फरवरी, 2014

ज्योतिष जगत में सूर्य को आत्मा, राजा, सत्ताधारी, सरकार, ख्याति, शोर्य, प्रतिष्ठा आदि विषयों से संबंधित ग्रह माना जाता हैं। किसी व्यक्ति विशेष की पत्रिका में जब अन्य ग्रहों के साथ-साथ सूर्य उच्च, मित्र या स्वराशिगत हो तो और षडबल में भी बलवान हो तो व्यक्ति को सरकारी सेवा का अवसर प्राप्त होने का अवसर प्राप्त होता हैं यदि ऐसा नही तो स्वयं का व्यवसाय अवस्य करता हुआ मिलेगा। यदि प्राइवेट  नौकरी करनी भी पडे तो ज्यादा समय तक नही करेगा। यदि सुर्य नीच राशि में स्थित हो तो भी व्यक्ति छोटे या बडे स्तर की संस्था में प्रबंध का कार्य करता हुआ मिलेगा। इस मामले में  मामले में मेष व तुला लग्न वालो को वैवाहिक सुख की प्राप्ति नही होती हैं यदि हो तो जल्द ही अलग होने की स्थिती बनने लगती हैं।

ऐसे विद्यार्थी जिनके सूर्य बलवान हो वे एक या दो प्रतियोगी परिक्षओ  में ही सफलता हासिल कर सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेते हैं। जबकि कमजोर सूर्य वाल निरंतर प्रयास के बाद भी सफलता से वंचित ही रहते हैं। पत्रिका में स्थित सूर्य के परिणाम कब प्राप्त होगें इसकी पुष्टि ग्रहों की महादशा के साथ-साथ गोचर भी अदा करता हैं। सूर्य का राशि परिवर्तन मकर से तुला में 13 फरवरी को प्रात: 2 बजकर 13 मिनट पर हो रहा हैं। 14 मार्च तक सूर्य इसी राशि में स्थित रहेंगे। कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं। शनि को ज्योतिष में भृत, दास, सेवक व न्यायधीश के रूप में जाना जाता हैं। अर्थात राजा (सूर्य) सेवक (शनि) के घर जा रहें हैं। सूर्य के गोचर की यह स्थिती  राजनैतिक उथल पुथल का होना दर्शाती हैं। साथ ही 18 फरवरी को बुध भी वक्री होकर शनि की दूसरी राशि मकर में प्रवेश करेंगें। बुध ग्रह वाणी के कारक हैं जो रानेताओं में तरह तरह की टिप्पणियों मे बढोत्तरी करेगें। इस दौरान सत्ता में अविश्वनीय घटनाक्रम देखने को मिलेगा। जिसे मीडिया भुनाता हुआ दिखाई देगा। सत्तारूढ दलो में टकराव के प्रबल योग हैं। 

आइये जाने प्रत्येक राशि पर सूर्य के गोचर का क्या प्रभाव पडेगा।

1. मेष- मेष राशि से सूर्य लाभ भाव में गोचर करेगें। आपकी महत्वपूर्ण महत्वकांक्षाए पूर्णता की और बढती दिखाई देगी। अनुबंधो और समझौतो में उत्तराद्र्ध गोचर से लाभ प्राप्त होगा। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आएगी। प्रेम प्रसंगो से संबंधित मामलो में बढोत्तरी हीगी।

2. वृष- अपाकी राशि से सूर्य का गोचर दशम भाव से हो रहा हैं। पत्रिका का दशम भाव आजिवीका से संबंधित होता हैं। अत: व्यापार से लाभ की मात्रा बढेगी। यदि आप सेवारत हैं तो पद-प्रतिष्ठा बढ सकती हैं। अधिकरी वर्ग आपके किये गए कार्यों से खुश रहेगें। अपने व्यवसाय को बढाने या नवीन व्यापार हेतु धन की पूर्ति ऋण के रूप में प्राप्त होगी। किसी पुराने मित्र या रिश्तेदार से मुलाकात हो सकती हैं।

3. मिथुन- सूर्यदेव आपकी राशि से नवम भाव यानी भाग्य भाव से गोचर करेगें। इस गोचर से माता-पिता को स्वास्थय संबंधी समस्या हो सकती हैं। अधिकारी वर्ग से संबंधित लोगो से मेलजोल लाभप्रद रहेगा। किसी धार्मिक स्थल की यात्रा के योग भी बन सकते हैं। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आएगी। पूर्वाद्ध की अपेक्षा उत्तराद्र्ध लाभप्रद रहेगा।
4. कर्क- कर्क राशि से सूर्य का गोचर अष्टम भाव में हो रहा हैं। व्यवसाय में अचानक नुकसान या सकस्या शुरू हो सकती हैं। यदि आप नोकरी करते है तो अधिकारी वर्ग आपके कार्यो से नाखुश रहेगें। यदि आपका प्रमोशन इस दौरान होना है तो निराशा होना पड सकता हैं। भूमि-भवन संबंधित मामलो के गति आएगी। अपने व्यवसाय को बढाने या नवीन व्यापार हेतु धन की पूर्ति ऋण के रूप में प्राप्त होगी। आपकी राशि को शनि पहले ही ढैया लगाकर पीडित कर रहें है। किसी नवीन योजना का क्रियांवयन नवम्बर तक टाले अन्यथा हानि उठानी पड सकती हैं।

5. सिंह- सुर्य आपकी राशि से सप्तम भाव से गोचर करेगें। साझेदारी व्यापार में मतभेद हो सकता हैं। आपका विश्वास साझेदार से उठने लगेंगा। जिसके कारण हानि भी हो सकती हैं। जिवनसाभी से भी मतभेद बढ सकता हैं। घरेलू समस्याओं का हल शांतिपूर्वक निकालें। इस माह जन्म लेने वाले शिशुओं में बालिका की अपेक्षा बालको की संख्या अधिक होगी।

6. कन्या- सूर्य का यह गोचर आपके लिए लाभप्रद रहेगा। कोई लम्बा विवाद जो अदालत या अन्यत्र चल रहा हैं  वह अब अपने पक्ष में होता हुआ दिखाई देगा। एक और जहां शनि की साढेसाती आपकी पैरो पर हैं वही सूर्य राशि से षष्ठम भाव में होगें जो शत्रुओ की पराजय का परिचायक हैं। अर्थ लाभ की प्राप्ति हो सकती हैं। वाहन सावधानी से चलाए दुर्घटना हो सकती हैं।

7. तुला- आपकी राशि तुला से सूर्य गोचरवश पंचम भाव में आऐगें। सूर्य का यह गोचर संतान के कष्ट को दर्शाता हैं। यदि आप नौकरी करते है तो कार्यभार तो बढेगा किन्तु पद नही। यदि आप व्यावसाय करते हैं तो हानि हो सकती हैं। यात्रा में कष्ट हो सकता हैं अत: यात्रा से बचे। प्रेम संबंधो के लिए समय अभी अनुकूल नही हैं।

8. वृश्चिक- आपकी राशि से सूर्य चतुर्थ भाव से गोचर करेगें। पत्रिका का चतुर्थ भाव माता, भूमि-भवन, सुख सुविधओ से संबंधित होता हैं। अत: उपरोक्त मामलो से कष्ट प्राप्त हो सकता हैं। माता को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती हैं। रियलस्टेट में किया गया निवेश हानि दे सकता हैं।

9. धनु- आपकी राशि से सूर्य तृतीय भाव से गोचर करेंगें। तृतीय भाव पराक्रम, Self Confidence  छोटे भाई-बहनों से संबंधित होता हैं। सूर्य के इस गोचर से आप कोई दुस्साहस पूर्ण निर्णय ले सकते हैं जो आगें जाकर हानिकारक हो सकता हैं। भाइयों से सहयोग की आशा करना व्यर्थ हैं। गोचर का उत्तराद्र्ध कार्य के हिसाब से ठीक रहेगा।

10. मकर- सूर्य आपकी राशि मकर से द्वितीय भाव से गोचर करेगें। द्वितीय भाव वाणि, धन, कुटुम्ब से संबंधित होता हैं। सूर्य अग्नितत्व ग्रह हैं जो वायुतत्व राशि मकर में स्थित हैं। आपकी वाणी लागो पर अग्नि के समान प्रहार वाली होगी। अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें अन्यथा भारी नुकसान उठाना पड सकता हैं। कार्यस्थल पर आपके द्वारा किये गए कार्यों की प्रशंसा होगी। Real Estate से संबंधित विषयो से लाभ हो सकता हैं।

11. कुंभ- सूर्य का आपकी राशि कुंभ से गोचर मांसिक तनाव को बढावा देने वाला होगा। कार्यस्थल पर कार्यभार तो बढेगा किन्तु पद नही, परिणामस्वरूप मांसिक अवसाद हो सकता हैं। गोचर के उत्तराद्र्ध मे पद भी बढ सकता हैं। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आऐगी। वैवाहिक जिवन में अब मधुरता आने लगेंगी।

12. मीन- प्रत्येक भाव से द्वादश भाव उस भाव का नुकसान करता हैं। आपकी राशि मीन से सूर्य द्वादश भाव से गोचर करेगें। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती हैं। सूर्य का यह गोचर आपके लिए चिंताओ भरा होगा। एक और जहा अर्थ प्रबन्ध की समस्या हो सकती हैं। वही कार्यस्थल पर भी समस्यां उत्पन्न होने लगेगी। यदि आप व्यवसाय करतें हैं तो नवीन आडॅर प्राप्त नही होगें। अधिकारी वर्ग थोडे नाराज से हो चलेगें। कोर्ट कचहरी से संबंधित विषयो में निराशा हाथ लगेंगी। भाग्य भी साथ छोडता हुआ सा महसूस होगा। परन्तु चिंता न करें गोचर का उत्तराद्र्ध लाभप्रद रहेगा। अविवाहितो के संबंध तय होगें।

Thursday, 6 February 2014

वास्तु सुधार में लिए जा रहे वास्तु के Products की वास्तविक्ता

श्रीमद् भगवत् गीता में एक श्लोक हैं-
            ऊध्र्वमूलमध: शाखमश्वत्थं प्राहुरत्ययम्।
          छंदासि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।
अर्थात:- कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष हैं जिसकी जडें तो ऊपर है और शाखाँए जीचे की ओर तथा ऊसकी पत्तियाँ वैदिक स्तोत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता हैं, वह वेदो का ज्ञाता हैं।
                        इसी क्रम में जो व्यक्ति वेदो का ज्ञाता हो उसे भूत, भविष्य और वर्तमान सभी का पता होता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर आदि युगो में ऋषियो की वाणि में सत्यता तप द्वारा ही आती थी। कलयुग के विषय में उन्हें पहले से ही पता था कि इस युग के विद्वानो की वाणि में उतनी क्षमता नही होगी। ना ही वे किसी का भूत, भविष्य आदि बता पाऐगें। अत: उन्होनें मानव कल्याण के लिए ज्योतिष वास्तु आदि कई अन्य विधियों, सूत्रो की रचना की, उन्होने सिर्फ मानव कल्याण को लक्ष्य मानकर ही इन विद्याओं को मुर्त रूप दिया। ऋषियों द्वारा वर्णित सूत्रो से प्रत्येक व्यक्ति का भूत वर्तमान व भविष्य में होने वाली घटनाओ का जाना जा सकता हैं। जिससे भविष्य में घटित होने वाली घटनाओ से बचा जा सकता हैं साथ ही वर्तमान को भी सुधारा जा सकता हैं।
            इसे हम यू समझ सकतें है, जैसे प्रत्येक व्यक्ति को देवता भाग्य के 100 अंक देकर भेजते हैं लेकिन ये अंक उसे एक साथ न देकर इधर-उधर बिखेर देते हैं व्यक्ति के पूर्व जन्मों के कर्मो के अनुसार। ज्योतिष केवल उन बिखरे हुए भाग्य के अंको को कैसे प्राप्त किया जाए उसका मार्ग ही बता सकता हैं।
            वर्तमान समय में ज्योतिष व वास्तु का प्रचलन तेजी से बढ रहा हैं साथ ही साथ ऐसे लोगो का जनसमूह भी बढ रहा हैं जो अपने को वास्तुशास्त्री व ज्योतिषी बतातें हैं चाहे उन्हें इस विद्या का ज्ञान न भी हो तो भी वे लोगो को सफलता प्राप्ति हेतु वास्तु के विभिन्न Products का उपयोग वास्तु दोष निवारण में करते हैं। जिसका वास्तु सुधार तो दूर वास्तू  से भी दूर-दूर तक कोई लेना देना नही होता हैं।

यहाँ हम कुछ वास्तु संबंधी Products की चर्चा करेगें कि वे वास्तु सुधार में कारगर है भी या नही -

1.         सीसा - किसी भी व्यक्ति का मकान यदि T Point बना हो तो वास्तु के हिसाब से यह अशुभ माना जाता हैं। यदि मकान का मुख्य द्वार ‘T’ पर हो तो अशुभता की मात्रा और भी बढ जाती हैं। ऐसे मकानो में आधुनिक वास्तुशास्त्री सीसे का प्रयोग सामने से आ रही सडक के समने लगाकर यह मान है कि घर में Negative उर्जा नही आएगी बल्कि उसका रुख वापस सडक पर हो गया हैं।

  किसी भूखण्ड का कोई कोणा कट रहा हो तो भी शीशे का प्रयोग इस प्रकार किया जाता हैं कि भूखण्ड के अन्दर से शीशे में देखने पर अपनी Boundry Wall का प्रतिबिम्ब दिखाई देता हैं। ऐसा करके ये कहते है कि कटान खत्म हो गया या कहेगें कि बढ गया हैं।
            यह धारणा बिलकुल निरर्थक हैं, शीशे का आविष्कार 6000 ईसा वर्ष पूर्व हुआ जबकि हमारे वेद, पुराण, ग्रंथ इससे काफी पुराने है, उस समय जब सीसे नही हुआ करते थे। इसे यु समझे एक बार बचपर में भगवान श्रीराम जी ने माता से चाँद को छुने की जिद् की तो माता कोशल्या ने पानी में चाँद को दिखाया न कि सीसे में। तो सीसा वास्तु दोष निवारण में किस प्रकार सक्ष्म हुआ।
            यह हमें खुद ही समझना होगा। यदि शीशे से ही भूखण्ड का आकार घटाया या बढाया जा सकता तो आज गरीब से गरीब व्यक्ति के पास स्वयं का भुखण्ड होता।

A-1
2.         Copper Wire- आज कल Copper Wire प्रयोग भी काफी प्रचलन में है, दिये गए चित्र संख्या ‘A-1’ में जिसका वायव्य कोना बढा हुआ हैं असे ठीक करने के लिए Copper Wire का प्रयोग करते है। चित्र संख्या ‘A-2’ के अनुसार Copper Wire को भूमि के अन्दर दबाकर कहते है कि अब आपका भूखण्ड का दोष समाप्त हो गया हैं। आपका भुखण्ड के अब दो भागो में विभजित हो गया हैं चित्र ‘A-3’ अनुसार। पहला भाग ‘क’ जो दोष रहित हैं दूसरा
A-2
                                                   
‘ख’ भाग जो दोषपूर्ण है उसे अलग कर दिया हैं। स विधि से आपका  वास्तु दोष सम्पन्न हुआ। जबकि निर्माण कार्य सम्पूर्ण भूखण्ड पर करवाया जाता हैं। दोषपूर्ण हिस्से में शोचालय, गेरेज या गायो हेतु प्रयोग में लिया जाता हैं। ऐसा प्रयोग वास्तु सम्मत नही होता हैं। ऐसे उपायो से वास्तुशास्त्री की तो चॉदी होती हैं परन्तु शुभफल की प्राप्ति भू-स्वामी को कभी भी प्राप्त नही हो पाती हैं।



2.         पाईप का प्रयोग - एक बार मै जयपुर में स्थित सरनाडूंगर औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री के वास्तु संबंधी जाँच के लिए गया। फैक्ट्री फर्नीचर व्यवसाय से संबंधित थी। जिसमें पहले दो साझेदार हुआ करते थे। एक या दो वर्ष बाद दोनो अलग हो गए। पहला साझेदार नारायण व दूसरा हर्षित था। अलग होकर हर्षित ने पास में ही नयी फैक्ट्री
किराये पर लेकर वही व्यापार आरंभ कर दिया। नारायण उसी फैक्ट्री में बना रहा। अगले 4-5 वर्षो में नारायण को काफी घटा हुआ, जिसके परिणामस्वरुप उसे फैक्ट्री छोडनी पडी जो उसने किराये।
           हर्षित का कार्य जोरो पर था, उसने वह फैक्ट्री जो नारायण के पास थी उसे भी किराये पर ले लिया। हर्षित का दुर्भाग्य भी इसी के साथ शुरू हो गया। जब मै वहॉ पहुँचा तो मैने देखा की भूखण्ड के मध्य भाग से उत्तर दिशा में ही सारा निर्माण कार्य हो रखा हैं तथा दक्षिण दिशा निमार्ण रहित हैं। फैक्ट्री का मुख्य द्वार भी दक्षिण-पूर्व के कोने में स्थित हैं। भूखण्ड के मध्य भाग्य का दोष जहा वशं वृद्धि को बाधित करता हैं। यहाँ फैक्ट्री के विस्तार अर्थात वृद्धि को बाधित कर रहा हैं, वही उत्तर दिशा में स्थित भारी निर्माण गरीबी लाता हैं। दक्षिण-पूर्व का मुख्य द्वार भी अनावश्यक घटनाओ को बढाता हैं।
            मैनें कहा कि इस भूखण्ड में एक बार निर्माण कार्य पूर्ण हो जाने के बाद नवीन निमार्ण हेतू एक भी ईंट नही रखी गई होगी। इस बात की पुष्टि हर्षित ने हामी भर कर दी। जब हम टहलते-टहलते पहली मंजिल पर पहुँचे तो मैने देखा कि स्टाफ के लिए शोचालय का निर्माण भी उत्तर दिशा पर स्थित दिवारर पर हो रखा हैं। मैरी बात को यह निर्माण ओर भी सिद्ध करता हैं।
            उत्तर दिशा के स्वामी देवता कुबेर व लक्ष्मी जी हैं। कुबेर व लक्ष्मी जी धन-धान्य से संबंधित देवी देवता हैं। अत: उत्तर दिशा मे निर्मित शोचालय घर की सम्पन्नता को धीरे-धीरे कम करने लगता हैं। मैने हर्षित को अन्य वास्तु सम्मत समाधानो के बाद जब कहा कि आप भूखण्ड के दक्षिण दिशा जो निर्माण रहित हैं उसे निर्माण करवाकर भारी करें तो उन्होनें कहाँ कि आपसे पहले एक वास्तुशास्त्री आएं थे। उन्होनें दक्षिण दिशा को भारी करने के लिए भूखण्ड के दक्षिण-पश्चिम कोने में एक लोहे का पाईप झंडा लगाकर लगवाया हैं। मैने देखा सचमुच ऐसा हो रखा था। मैने मन ही मन सोचा कि आजकल के वास्तुशास्त्री किस राह में निकल पडे हैं।
            खैर मैने हर्षित से पूछा कि दक्षिण दिशा भारी होने पर कोई फायदा हुआ क्या? 6 माह बीत चुके हैं कोई फायदा नही हुआ इसलिए तो आपको बुलाया हैं।
                        वास्तु का अर्थ निर्माण से हैं। समराङ्गण सूत्रधार के अनुसार कोई भी निर्मित संरचना वास्तु हैं।  जिसमें व्यक्ति को वर्षा, गर्मी, सर्दी आदि से बचाव कि व्यवस्था की जाती हैं। तो क्या हम एक लोहे के पाईप के नीचे इन सभी ऋतुओं से बच सकते हैं यदि नही तो उपाय कारगर नही हैं। इस दृष्टिकोण से हमें स्वयं सोचना होगा।

3.         पिरामींड -  पिरामिंड का प्रयोग भी वास्तु सुधार संबंधी उपायो में से एक हैं कहीं इसका प्रयोग दरवाजो को बंद करने के रूप मे तो कही आकार में बडे पिरामिंडो का प्रयोग उर्जा नियेत्रण हेतु किया जाता हैं।  यदि मुख्य द्वार गलत दिशा में स्थित हो तो प्लास्टिक के छोटे आकार के पिरामिंडो प्रयोग द्वार को बन्द करने के लिए किया जाता हैं।  चित्र संख्या  ‘A-4’ के अनुसार पिरामिंडो को लगाकर यह कहतें हैं कि पिरामिंडो के प्वाइंट आपस में मैगनेटिक उर्जा के माध्यम से द्वार को बन्द करते हैं(चित्र संख्या ‘A-5’ के अनुसार )। आपका दोषपूर्ण द्वार हमने बंद कर दिया हैं ऐसा कहते हैं।


यहाँ हमें यह समझना होगा कि पिरामिंड लगाने के बाद भी हम आने जाने के लिए वही द्वार उपयोग मे ले रहें हैं तो कि पिरामिंडो द्वारा बंद किया जा चुका है। क्या हम किसी भी दिवार के आर पार आ जा सकते हैं यदि नही तो ये नासमझी क्यों।