Thursday, 22 November 2018

क्या आप भी बाजार से यंत्र लाकर पूज रहे हैं, तो पहले इसे पढ़ें, किस कामना के लिए कौन सा यंत्र पूजें

यंत्र व मंत्र का प्रभाव अकल्पनीय होता है। अभीष्ट फल की प्राप्ति हेतु पूरे विधि-विधान से यंत्र/ यंत्र जोड़ों की प्रतिष्ठा करना श्रेयस्कर होता है। विशेष यंत्र जोड़ों की जानकारी यहां दी जा रही है।

* धनवृद्धि- श्री गणेश, महालक्ष्मी, कुबेर एवं श्रीयंत्र।

* व्यापारिक सफलता हेतु- श्री गणेश, कुबेर, नवग्रह एवं व्यापार वृद्धि यंत्र।

* पारिवारिक सुख- शांति के लिए- वास्तुदोष नाशक, रिद्धि-सिद्धि, श्रीयंत्र एवं रत्नजड़ित चांदी का नवग्रह यंत्र।

* संतान प्राप्ति- संतान गोपाल, नवग्रह, सर्व कार्य सिद्धि एवं पति-पत्नी की राशि का मंत्र।

* मांगलिक दोष को दूर करने के लिए- मंगल त्रिकोण, हनुमंत पूजन, मंगल यंत्र एवं रत्न मूंगा।
*शीघ्र विवाह हेतु- शिव यंत्र, सर्वकार्य सिद्धि, राशि यंत्र एवं विशेष पूजा क्रिया।

विधि

पूजन हेतु यंत्रों को लाल मखमली आसन (बगलामुखी यंत्र को पीला) प्रदान कर मौली (कलावा) के वस्त्र पहनाएं फिर चंदन या कुमकुम, साबुत चावल का टीका लगाएं एवं धूप-अगरबत्ती लगाकर प्रणाम कर अपनी अभीष्ट प्राप्ति हेतु ध्यान लगाएं, मंत्र जाप करें। प्रतिदिन चंदन या कुमकुम लगाकर धूप अगरबत्ती करें। हमारा विश्वास है कि पूजा की यह वि‍धि अवश्य ही कारगर होगी और ईश्वर आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे।

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत की ये पौराणिक कथाएं पढ़ने-सुनने मात्र से होगी बैकुंठ लोक की प्राप्ति

बैकुंठ चतुर्दशी पर पढ़ें पौराणिक कथाएं

कथा- 1

बैकुंठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है नारद जी पृथ्वी लोक से घूम कर बैकुंठ धाम पहुंचते हैं। भगवान विष्णु उन्हें आदरपूर्वक बिठाते हैं और प्रसन्न होकर उनके आने का कारण पूछते हैं।
       नारद जी कहते है- हे प्रभु! आपने अपना नाम कृपानिधान रखा है। इससे आपके जो प्रिय भक्त हैं वही तर पाते हैं। जो सामान्य नर-नारी है, वह वंचित रह जाते हैं। इसलिए आप मुझे कोई ऐसा सरल मार्ग बताएं, जिससे सामान्य भक्त भी आपकी भक्ति कर मुक्ति पा सकें।
     यह सुनकर विष्णु जी बोले- हे नारद! मेरी बात सुनो, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करेंगे और श्रद्धा-भक्ति से मेरी पूजा-अर्चना करेंगे, उनके लिए स्वर्ग के द्वार साक्षात खुले होंगे।
   इसके बाद विष्णु जी जय-विजय को बुलाते हैं और उन्हें कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा थोड़ा-सा भी नाम लेकर पूजन करेगा, वह बैकुंठ धाम को प्राप्त करेगा।

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कथा- 2

करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र जो शिव जी ने दिया था श्री‍हरि विष्‍णु को, पढ़ें कथा

पौराणिक मतानुसार एक बार भगवान विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। वहां मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने 1000 (एक हजार) स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प किया। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया।
   भगवान श्रीहरि को पूजन की पूर्ति के लिए 1000 कमल पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आंखें भी तो कमल के ही समान हैं। मुझे 'कमल नयन' और 'पुंडरीकाक्ष' कहा जाता है। यह विचार कर भगवान विष्णु अपनी कमल समान आंख चढ़ाने को प्रस्तुत हुए।
   विष्णु जी की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले- 'हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब 'बैकुंठ चतुर्दशी' कहलाएगी और इस दिन व्रतपूर्वक जो पहले आपका पूजन करेगा, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी।
   भगवान शिव ने इसी बैकुंठ चतुर्दशी को करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान किया। शिवजी तथा विष्णुजी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगें। मृत्यु लोक में रहने वाला कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह अपना स्थान बैकुंठ धाम में सुनिश्चित करेगा।

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कथा 3

जब पापी धनेश्वर ब्राह्मण को हुई बैकुंठ धाम की प्राप्ति

धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण था जो बहुत बुरे काम करता था, उसके ऊपर कई पाप थे। एक दिन वो गोदावरी नदी में स्नान के लिए गया, उस दिन बैकुंठ चतुर्दशी थी। कई भक्तजन उस दिन पूजा-अर्चना कर गोदावरी घाट पर आए थे, उस भीड़ में धनेश्वर भी उन सभी के साथ था।
   इस प्रकार उन श्रद्धालुओं के स्पर्श के कारण धनेश्वर को भी पुण्य मिला। जब उसकी मृत्यु हो गई तब उसे यमराज लेकर गए और नरक में भेज दिया।
तब भगवान विष्णु ने कहा यह बहुत पापी हैं पर इसने बैकुंठ चतुर्दशी के दिन गोदावरी स्नान किया और श्रद्धालुओं के पुण्य के कारण इसके सभी पाप नष्ट हो गए इसलिए इसे बैकुंठ धाम मिलेगा। अत: धनेश्वर को बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।

जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट करना है तो कार्तिक मास में इन पुष्पों से करें श्री विष्णु की पूजा

साेमवार, 14 अक्‍टूबर 2019 से कार्त‍िक का महीना शुरू हो गया था तथा इस मास की समाप्ति 12 नवंबर, शुक्रवार कार्तिक पूर्णिमा के साथ होगी। इस महीने में खासतौर पर श्री विष्णु पूजन किया जाता है। कार्तिक माह भगवान विष्णु का महीना माना गया है। पूरे कार्तिक मासपर्यंत निम्न फूलों से श्री हरि भगवान विष्णु का पूजन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इतना ही नहीं विशेष कर देवउठनी एकादशी या हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन तो अवश्य ही इन पुष्पों से नारायण का पूजन करना चाहिए। इन पुष्पों के साथ ही तुलसी दल से पूरे कार्तिक मास में विष्‍णु पूजन करने से मनुष्य को सभी तरह के सुख और चारों दिशाओं से समृद्धि की प्राप्ति होती है।

आइए जानें...


  1. कार्तिक मास में जो मनुष्य बिल्व पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
  2. जो मनुष्य वकुल और अशोक के फूलों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, वे सूर्य-चंद्रमा रहने तक किसी प्रकार का शोक नहीं पाते।
  3. जो मनुष्य अगस्त्य के पुष्प से भगवान विष्‍णु का पूजन करते हैं, उनके आगे इंद्र भी हाथ जोड़ता है। तपस्या करके संतुष्ट होने पर हरि भगवान जो नहीं करते, वह अगस्त्य के पुष्पों से भगवान को अलंकृत करते हैं।
  4. कार्तिक मास में तुलसी दर्शन करने, स्पर्श करने, कथा कहने, नमस्कार करने, स्तुति करने, तुलसी रोपण, जल से सींचने और प्रतिदिन पूजन-सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  5. जो मनुष्य तुलसी का पौधा लगाते हैं, उनके कुटुम्ब से उत्पन्न होने वाले प्रलयकाल तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  6. जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी का रोपण करता है और रोपी गई तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युगपर्यंत तुलसी रोपण करने वाले सुकृत का विस्तार होता है।
  7. जिस किसी मनुष्य द्वारा रोपी गई तुलसी से जितनी शाखा, प्रशाखा, बीज और फल पृथ्वी में बढ़ते हैं, उसके उतने ही कुल जो बीत गए हैं और होंगे, वे 2,000 कल्प तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  8. जो मनुष्य कदम्ब के पुष्पों से श्रीहरि का पूजन करते हैं, वे कभी भ‍ी यमराज को नहीं देखते।
  9. जो भक्त गुलाब के पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उन्हें मुक्ति मिलती है।
  10. जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं, उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
  11. जो मनुष्य भगवान विष्णु पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल पाते हैं।
  12. जो मनुष्य दूब के अंकुरों से भगवान की पूजा करते हैं, वे 100 गुना पूजा का फल ग्रहण करते हैं।
  13. जो मनुष्य विष्णु भगवान को चंपा के फूलों से पूजते हैं, वे फिर संसार में नहीं आते।
  14. पीले रक्त वर्ण के कमल पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को श्वेत द्वीप में स्थान मिलता है।
  15. जो भक्त विष्णुजी को केतकी के पुष्प चढ़ाते हैं, उनके करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  16. जो मनुष्य शमी के पत्र से भगवान की पूजा करते हैं, उनको महाघोर यमराज के मार्ग का भय नहीं रहता।
  17. कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी से भगवान का पूजन करते हैं, उनके 10,000 जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

कार्तिक मास में दीप दान करना ना भूलें, शुभ फल के साथ होगी हर कामना पूरी, पढ़ें ये 7 खास नियम

हिन्दू पौराणिक और प्राचीन ग्रंथों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। पुराणों में कहा है कि भगवान नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है।


धर्म शास्त्रों के अनुसार इस पूरे कार्तिक मास में व्रत व तप का विशेष महत्व बताया गया है। उसके अनुसार, जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत व तप करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है। ये 7 नियम इस प्रकार हैं -

1. नियम :

दीप दान - धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीप दान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीप दान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

2. नियम :

तुलसी पूजन - इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

3. नियम :

भूमि पर शयन - भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।

4. नियम :

तेल लगाना वर्जित - कार्तिक महीने में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल लगाना वर्जित है।

5. नियम :

दलहन (दालों) खाना निषेध - कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना चाहिए।

6. नियम :

संयम रखें - कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।

7. नियम :
ब्रह्मचर्य का पालन - कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

Tuesday, 18 October 2016

लक्ष्मी को साधने के लिए करें ये।


आज के युग में आजीविका बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारतीय वैदिक दर्शन शास्त्रों में विषम परिस्थितियों में लाभ पाने के लिये टोने-टोटके या धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा भी लिया जाता है, इनके माध्यम से ओवर ड्राफ्टिंग के माध्यम से संचित में से कुछ बेहतर प्रारब्ध पाने की चेष्टा करते है।

इसके अनेकों उदाहरण मिलते हैं जैसे कि वर्ष में मुख्य दो बार आने वाले नवरात्रों के पर्व में श्री मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित श्री दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोकों का संग्रह है और उसी में `वृत्ति` को भी देवी मानकर नमस्कार किया गया है।

इस सप्तशती में प्रथम चरित्र अध्याय-1 की देवी महाकाली जी है। 
मध्य चरित्र अध्याय दो से चार तक की देवी महालक्ष्मी जी है और उत्तम चरित्र अध्याय 5 से 13 तक की देवी महा सरस्वती जी है। अर्थात ज्ञान की देवी सरस्वती के अध्याय ज्यादा है सूचित करते है कि बुद्धि के द्वारा लक्ष्मी को प्राप्त किया जा सकता है और संसार की तामसिक प्रवृत्तियों से सुरक्षा की जा सकती है।

तभी अध्याय 5 जहां सरस्वती जी आरम्भ होती है अर्थात पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 59 से 61 तक में कहा गया है।
`या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:॥`
अर्थात जो देवी सब प्राणियों में वृत्तिरूप से स्थित है। उनको नमस्कार, उनको वारंबार नमस्कार।
वृत्ति को देवी रूप में मानकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया गया है अर्थात वृत्ति जीवन में अति महत्वपूर्ण चीज है।

इसी प्रकार इसी पुस्तक में धन की कामना पूर्ति हेतु एक विशेष सूत्र दिया गया है, वह इस प्रकार से है-
`भौमवास्यानिशमग्ने चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठते् स्त्रोतं स भवेत् सम्पदां पद्म॥`
अर्थात मंगलवार की अमावस्या की आधी रात में जब चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों। उस समय इस स्त्रोत को लिखकर जो इसका पाठ करता है वह संपत्तिशाली होता है।

इस श्लोक में मुहूर्त विज्ञान के माध्यम से ज्योतिष की ही गणना है कि जब मंगलवार को ही अमावस्या हो और शतभिषा नक्षत्र में अर्थात राहु के उस नक्षत्र में जहां सौ तारों की बात में कुंभ राशि में हो।

इसी प्रकार सूर्य दीपावली पर्व पर तुला राशि में होता है उस दिन आत्मा और मन के कारक सूर्य, चंद्रमा इकट्ठे होते हैं तो स्थिर लग्न में  श्रीवृद्धि के लिए लक्ष्मी पूजन किया जाता है। 

Friday, 18 December 2015

जैमिनी ज्योतिष

जैमिनी पद्धति के अनुसार व्यवसाय चयन हेतु कारकांश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (कारकांश आत्म कारक का नवमांश है) यदि कारकांश या उससे दसवां किसी ग्रह से युक्त न हो तो कारकांश से दशमेश की नवमांश में स्थिति से व्यवसाय ज्ञात किया जाता है।
1) कारकांश में सूर्य राजकीय सेवा देता है और राजनैतिक नेतृत्व देता है।
2) पूर्ण चंद्र व शुक्र कारकांश में लेखक व उपदेशक बनाता है।
3) कारकांश में बुध व्यापारी तथा कलाकार का योग प्रदान करता है।
4) बृहस्पति कारकांश में जातक को धार्मिक विषयों का गूढ़ विद्वान व दार्शनिक बनाता है।
5) कारकांश में शुक्र जातक को सरकारी अधिकारी शासक व लेखक बनाता है।
6) कारकांश में शनि जातक को विख्यात व्यापारी बनाता है।
7) कारकांश यदि राहु हो तो मशीन निर्माण कार्य, ठगी का कार्य करने वाला जातक को बना देता है।
8) कारकांश का केतु से संबंध हो तो जातक नीच कर्म तथा धोखाधड़ी से आजीविका कमाता है।
9) कारकांश यदि गुलिक की राशि हो और चंद्र से दृष्ट हो तो व्यक्ति अपने त्यागपूर्ण व्यवहार से और धार्मिक कार्यों से जीविका अर्जित करेगा।
10) कारकांश में यदि केतु हो और शुक्र से दृष्ट हो तो धार्मिक कार्यों से आजीविका अर्जित करेगा।
11) कारकांश यदि सूर्य व शुक्र द्वारा दृष्ट हो तो जातक राजा का कर्मचारी बनता है।
12) कारकांश से तीसरे और छठे में क्रूर ग्रह हों तो जातक खेती व बागवानी का कार्य करता है।
13) कारकांश में चंद्र हो और शुक्र से दृष्ट हो तो वह रसायन विज्ञान द्वारा आजीविका अर्जित करता है।
14) कारकांश में चंद्र यदि बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक डॉक्टर होता है।
15) कारकांश में शनि हो या उससे चौथे में हो तो जातक अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण होता है।
16) कारकांश से चौथे में सूर्य या मंगल शस्त्रों से जीविका प्रदान करता है।
17) कारकांश से पांचवें या लग्न में चंद्र व गुरु जातक को लेखनी द्वारा जीविका अर्जन प्रदान करते हैं।
18) कारकांश में पांचवें व सातवें में गुरु हो तो व्यक्ति सरकारी उच्च अधिकारी होता है।
19) कारकांश में यदि शनि हो तो जातक पैतृक व्यवसाय करता है।
20) कारकांश लग्न या उससे पंचम स्थान में अकेला केतु हो तो मनुष्य ज्योतिषी गणितज्ञ, कंप्यूटर विशेषज्ञ होता है।
21) कारकांश लग्न से पंचम में राहु हो तो जातक एक अच्छा मैकेनिक होता है।
22)यदि नवांश में राहु आत्मकारक के साथ हो तो जातक चोरी, डकैती से आजीविका चलाता है।
23) कारकांश लग्न से शनि चतुर्थ या पंचम हो तो जातक निशानेबाज होता है और यही आजीविका का साधन भी हो सकता है।
24) कारकांश से पंचम में शुक्र हो तो जातक को कविता करने का शौक होता है।
25) कारकांश से पंचम में यदि गुरु हो तो जातक वेदों और उपनिषेदों का जानकार और विद्वान होता है तथा यही जातक की आजीविका का साधन भी होता है।
26) कारकांश से पंचम में यदि सूर्य हो तो जातक दार्शनिक तथा संगीतज्ञ होता है।

रामायण का नाम वाल्मीकि जी ने राम चरित मानस क्यों रखा ?

तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की, तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा!आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है,वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?

बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो एक समय पर जाना होता है,मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.

और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.

इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"
राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal)में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical)
राम
चरित
मानस

किसी ने गोस्वामी जी से पूंछा आपने खड़े में क्यों लिखा तो गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस राम दर्शन की ,राम मिलन की सीढी है ,जिस प्रकार हम घर में कलर कराते है तो एक लकड़ी की सीढी लगाते है ,जिसे हमारे यहाँ नसेनी कहते है,जिसमे डंडे लगे होते है,गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस भी राम मिलन की सीढी है जिसके प्रथम डंडे पर पैर रखते ही श्रीराम चन्द्र जी के दर्शन होने लगते है,अर्थात यदि कोई बाल काण्ड ही पढ़ ले, तो उसे राम जी का दर्शन हो जायेगा.