Wednesday, 6 November 2019

इन 8 उपायों से होता है शीघ्र विवाह

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1. हल्दी के प्रयोग से उपाय
विवाह योग लोगों को शीघ्र विवाह के लिये प्रत्येक गुरुवार को नहाने वाले पानी में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करना चाहिए।  भोजन में केसर का सेवन करने से भी विवाह शीघ्र की संभावनाएं बनती है। 

2.  पीला वस्त्र धारण करना
विवाह के इक्छुक व्यक्ति को सदैव शरीर पर कोई भी एक पीला वस्त्र धारण करके रखना चाहिए। 

3.  वृ्द्धो का सम्मान करना
कभी भी व्यक्ति को अपने से बडों व वृद्धो का अपमान नहीं करना चाहिए। 

4.  गाय को रोटी खिलाना
विवाह के इक्छुक व्यक्ति को गुरुवार को गाय को दो आटे के पेडे पर थोडी हल्दी लगाकर खिलाना चाहिए साथ ही थोडा सा गुड व चने की पीली दाल भी खिलानी चाहिए ऐसा करने से शीघ्र विवाह की संभावनाएं बनती है। 

5.  शीघ्र विवाह प्रयोग
गुरुवार की शाम को पांच प्रकार की मिठाई, हरी ईलायची का जोडा तथा शुद्ध घी के दीपक के साथ जल अर्पित करना चाहिये।  यह प्रयोग लगातार तीन गुरुवार को करना चाहिए। 

शीघ्र विवाह के लिये यह एक अत्यंत गोपनीय  प्रयोग है। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार करना चाहिए। 

6.  केले के वृ्क्ष की पूजा
गुरुवार को केले के वृ्क्ष के सामने बृहस्पति देव के 108 नामों का उच्चारण करने के साथ शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए साथ ही जल भी अर्पित करना चाहिए। 

7.  मांगलिक योग का उपाय 
अगर किसी का विवाह कुण्डली के मांगलिक योग के कारण नहीं हो पा रहा है, तो ऎसे व्यक्ति को मंगलवार के दिन सतचण्डि का पाठ मंगलवार के दिन तथा शनिवार के दिन सुन्दरकाण्ड का पाठ करना चाहिए।  इससे भी विवाह में हो रहे अनावश्यक विलम्ब दूर होता है। 

8.  छुआरे सिरहाने रख कर सोना
यह उपाय उन व्यक्तियों को करना चाहिए।  जिन व्यक्तियों की विवाह की आयु हो चुकी है। इस उपाय को करने के लिये शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर किसी बर्तन में डालकर अपने बिस्तर के सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रात: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में इन्हें प्रवाहित कर दें। शीघ्र लाभ मिलता है

Devutthana Ekadashi Vrat 2019: चार माह बाद 8 नवंबर को जागेंगे देव, शुभ विवाह मुहूर्त 19 नवंबर से

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प्रति वर्ष चातुर्मास में भगवान शयनावस्था में होते है जिसके कारण सभी मांगलिक कार्यो पर रोक लग जाती है। इस वर्ष 2019 को चार माह की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु 8 नवंबर को देव प्रबोधिनी एकादशी जिसे  देवोत्थान एकादशी या  देव उठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी वर्ष के स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार यही वह दिन होता है जब भगवान अपनी चातुर्मास की निंद्रा से जागते है और यही से विवाह आदि समस्त मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं, लेकिन इस बार देव उठने के बाद विवाह के मुहूर्त 11 दिन बार से शुरू होंगे।  चुकी यह एकादशी अबूझ मुहुर्तो में से एक है इस दिन तो विवाह होते ही है परन्तु बाकि दिनों में तिथि, वार, कारण, ग्रहों का गोचर आदि कई विषयों को ध्यान में रखकर विवाह के मुहूर्त के समय का निर्णय किया जाता है। इस वर्ष देवउठनी एकदशी  पर विवाह तो होंगे ही परन्तु इसके बाद ठीक 11 दिन बाद से विवाह शुरू होंगे।

वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार देव प्रबोधिनी एकादशी शुक्रवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के संयोग में आ रही है। इस दिन रवि योग भी रहेगा। इस दिन मंदिरों तथा प्रत्येक हिन्दू घरो में  तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन भी होता है। विवाह समय निर्धारण में रेखाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है प्रत्येक पंचांगों में रेखाओं का उल्लेख दिया रहता है।  रेखा अनुसार विशिष्ट मुहूर्त 19 नवंबर से शुरू होंगे।

शुभ विवाह के मुहूर्त

नवंबर- 19, 20, 21, 22, 23, 28, 30

दिसंबर- 7, 11, 12

वर्ष 2020

जनवरी- 15, 16, 17, 18, 20, 29, 30, 31

फरवरी- 4, 9, 10, 16, 25, 26, 27

मार्च- 2, 1

उपनयन संस्कार मुहूर्त
जनवरी- 27, 29, 30, 31

फरवरी- 6, 13, 26, 28

मार्च- 5, 6, 11

मूर्ति प्रतिष्ठा  मुहूर्त
जनवरी- 17, 20, 27, 29, 30, 31

फरवरी- 1, 14, 16, 21, 26, 28

मार्च- 6, 11

गृह प्रवेश मुहूर्त
जनवरी- 17, 27, 30, 31

फरवरी- 26

मार्च- 6

Saturday, 2 November 2019

Gopashtami में कैसे करें गौ पूजन, पढ़ें ये खास बातें

इस वर्ष गोपाष्टमी का पर्व 4 नवंबर, सोमवार को मनाया जा रहा है। हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष महत्व माना गया है और उन्हीं को समर्पित हैं ये गोपाष्टमी पर्व। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार दिवाली के ठीक बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गौ चारण लीला शुरू की थी। कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन मां यशोदा ने भगवान कृष्ण को गौ चराने के लिए जंगल भेजा था। इस दिन गो, ग्वाल और भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने का महत्व है।

हिन्दू धर्म में गाय को माता का स्थान दिया गया है। अत: गाय को गौ माता भी कहा जाता है। आइए जानें कैसे मनाएं गोपाष्टमी पर्व?

* गोपाष्टमी यानी कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिन प्रात:काल में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नानादि करके स्वच्छ धुले हुए वस्त्र धारण करें।

* तत्पश्चात प्रात:काल में ही गायों को भी स्नान आदि कराकर गौ माता के अंग में मेहंदी, हल्दी, रंग के छापे आदि लगाकर सजाएं।

* इस दिन बछड़े सहित गाय की पूजा करने का विधान है।

* प्रात:काल में ही धूप-दीप, अक्षत, रोली, गुड़ आदि वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और धूप-दीप से आरती उतारी जाती है।

Thursday, 22 November 2018

क्या आप भी बाजार से यंत्र लाकर पूज रहे हैं, तो पहले इसे पढ़ें, किस कामना के लिए कौन सा यंत्र पूजें

यंत्र व मंत्र का प्रभाव अकल्पनीय होता है। अभीष्ट फल की प्राप्ति हेतु पूरे विधि-विधान से यंत्र/ यंत्र जोड़ों की प्रतिष्ठा करना श्रेयस्कर होता है। विशेष यंत्र जोड़ों की जानकारी यहां दी जा रही है।

* धनवृद्धि- श्री गणेश, महालक्ष्मी, कुबेर एवं श्रीयंत्र।

* व्यापारिक सफलता हेतु- श्री गणेश, कुबेर, नवग्रह एवं व्यापार वृद्धि यंत्र।

* पारिवारिक सुख- शांति के लिए- वास्तुदोष नाशक, रिद्धि-सिद्धि, श्रीयंत्र एवं रत्नजड़ित चांदी का नवग्रह यंत्र।

* संतान प्राप्ति- संतान गोपाल, नवग्रह, सर्व कार्य सिद्धि एवं पति-पत्नी की राशि का मंत्र।

* मांगलिक दोष को दूर करने के लिए- मंगल त्रिकोण, हनुमंत पूजन, मंगल यंत्र एवं रत्न मूंगा।
*शीघ्र विवाह हेतु- शिव यंत्र, सर्वकार्य सिद्धि, राशि यंत्र एवं विशेष पूजा क्रिया।

विधि

पूजन हेतु यंत्रों को लाल मखमली आसन (बगलामुखी यंत्र को पीला) प्रदान कर मौली (कलावा) के वस्त्र पहनाएं फिर चंदन या कुमकुम, साबुत चावल का टीका लगाएं एवं धूप-अगरबत्ती लगाकर प्रणाम कर अपनी अभीष्ट प्राप्ति हेतु ध्यान लगाएं, मंत्र जाप करें। प्रतिदिन चंदन या कुमकुम लगाकर धूप अगरबत्ती करें। हमारा विश्वास है कि पूजा की यह वि‍धि अवश्य ही कारगर होगी और ईश्वर आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे।

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत की ये पौराणिक कथाएं पढ़ने-सुनने मात्र से होगी बैकुंठ लोक की प्राप्ति

बैकुंठ चतुर्दशी पर पढ़ें पौराणिक कथाएं

कथा- 1

बैकुंठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है नारद जी पृथ्वी लोक से घूम कर बैकुंठ धाम पहुंचते हैं। भगवान विष्णु उन्हें आदरपूर्वक बिठाते हैं और प्रसन्न होकर उनके आने का कारण पूछते हैं।
       नारद जी कहते है- हे प्रभु! आपने अपना नाम कृपानिधान रखा है। इससे आपके जो प्रिय भक्त हैं वही तर पाते हैं। जो सामान्य नर-नारी है, वह वंचित रह जाते हैं। इसलिए आप मुझे कोई ऐसा सरल मार्ग बताएं, जिससे सामान्य भक्त भी आपकी भक्ति कर मुक्ति पा सकें।
     यह सुनकर विष्णु जी बोले- हे नारद! मेरी बात सुनो, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करेंगे और श्रद्धा-भक्ति से मेरी पूजा-अर्चना करेंगे, उनके लिए स्वर्ग के द्वार साक्षात खुले होंगे।
   इसके बाद विष्णु जी जय-विजय को बुलाते हैं और उन्हें कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा थोड़ा-सा भी नाम लेकर पूजन करेगा, वह बैकुंठ धाम को प्राप्त करेगा।

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कथा- 2

करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र जो शिव जी ने दिया था श्री‍हरि विष्‍णु को, पढ़ें कथा

पौराणिक मतानुसार एक बार भगवान विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। वहां मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने 1000 (एक हजार) स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प किया। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया।
   भगवान श्रीहरि को पूजन की पूर्ति के लिए 1000 कमल पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आंखें भी तो कमल के ही समान हैं। मुझे 'कमल नयन' और 'पुंडरीकाक्ष' कहा जाता है। यह विचार कर भगवान विष्णु अपनी कमल समान आंख चढ़ाने को प्रस्तुत हुए।
   विष्णु जी की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले- 'हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब 'बैकुंठ चतुर्दशी' कहलाएगी और इस दिन व्रतपूर्वक जो पहले आपका पूजन करेगा, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी।
   भगवान शिव ने इसी बैकुंठ चतुर्दशी को करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान किया। शिवजी तथा विष्णुजी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगें। मृत्यु लोक में रहने वाला कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह अपना स्थान बैकुंठ धाम में सुनिश्चित करेगा।

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कथा 3

जब पापी धनेश्वर ब्राह्मण को हुई बैकुंठ धाम की प्राप्ति

धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण था जो बहुत बुरे काम करता था, उसके ऊपर कई पाप थे। एक दिन वो गोदावरी नदी में स्नान के लिए गया, उस दिन बैकुंठ चतुर्दशी थी। कई भक्तजन उस दिन पूजा-अर्चना कर गोदावरी घाट पर आए थे, उस भीड़ में धनेश्वर भी उन सभी के साथ था।
   इस प्रकार उन श्रद्धालुओं के स्पर्श के कारण धनेश्वर को भी पुण्य मिला। जब उसकी मृत्यु हो गई तब उसे यमराज लेकर गए और नरक में भेज दिया।
तब भगवान विष्णु ने कहा यह बहुत पापी हैं पर इसने बैकुंठ चतुर्दशी के दिन गोदावरी स्नान किया और श्रद्धालुओं के पुण्य के कारण इसके सभी पाप नष्ट हो गए इसलिए इसे बैकुंठ धाम मिलेगा। अत: धनेश्वर को बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।

जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट करना है तो कार्तिक मास में इन पुष्पों से करें श्री विष्णु की पूजा

साेमवार, 14 अक्‍टूबर 2019 से कार्त‍िक का महीना शुरू हो गया था तथा इस मास की समाप्ति 12 नवंबर, शुक्रवार कार्तिक पूर्णिमा के साथ होगी। इस महीने में खासतौर पर श्री विष्णु पूजन किया जाता है। कार्तिक माह भगवान विष्णु का महीना माना गया है। पूरे कार्तिक मासपर्यंत निम्न फूलों से श्री हरि भगवान विष्णु का पूजन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इतना ही नहीं विशेष कर देवउठनी एकादशी या हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन तो अवश्य ही इन पुष्पों से नारायण का पूजन करना चाहिए। इन पुष्पों के साथ ही तुलसी दल से पूरे कार्तिक मास में विष्‍णु पूजन करने से मनुष्य को सभी तरह के सुख और चारों दिशाओं से समृद्धि की प्राप्ति होती है।

आइए जानें...


  1. कार्तिक मास में जो मनुष्य बिल्व पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
  2. जो मनुष्य वकुल और अशोक के फूलों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, वे सूर्य-चंद्रमा रहने तक किसी प्रकार का शोक नहीं पाते।
  3. जो मनुष्य अगस्त्य के पुष्प से भगवान विष्‍णु का पूजन करते हैं, उनके आगे इंद्र भी हाथ जोड़ता है। तपस्या करके संतुष्ट होने पर हरि भगवान जो नहीं करते, वह अगस्त्य के पुष्पों से भगवान को अलंकृत करते हैं।
  4. कार्तिक मास में तुलसी दर्शन करने, स्पर्श करने, कथा कहने, नमस्कार करने, स्तुति करने, तुलसी रोपण, जल से सींचने और प्रतिदिन पूजन-सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  5. जो मनुष्य तुलसी का पौधा लगाते हैं, उनके कुटुम्ब से उत्पन्न होने वाले प्रलयकाल तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  6. जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी का रोपण करता है और रोपी गई तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युगपर्यंत तुलसी रोपण करने वाले सुकृत का विस्तार होता है।
  7. जिस किसी मनुष्य द्वारा रोपी गई तुलसी से जितनी शाखा, प्रशाखा, बीज और फल पृथ्वी में बढ़ते हैं, उसके उतने ही कुल जो बीत गए हैं और होंगे, वे 2,000 कल्प तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।
  8. जो मनुष्य कदम्ब के पुष्पों से श्रीहरि का पूजन करते हैं, वे कभी भ‍ी यमराज को नहीं देखते।
  9. जो भक्त गुलाब के पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उन्हें मुक्ति मिलती है।
  10. जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं, उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
  11. जो मनुष्य भगवान विष्णु पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल पाते हैं।
  12. जो मनुष्य दूब के अंकुरों से भगवान की पूजा करते हैं, वे 100 गुना पूजा का फल ग्रहण करते हैं।
  13. जो मनुष्य विष्णु भगवान को चंपा के फूलों से पूजते हैं, वे फिर संसार में नहीं आते।
  14. पीले रक्त वर्ण के कमल पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को श्वेत द्वीप में स्थान मिलता है।
  15. जो भक्त विष्णुजी को केतकी के पुष्प चढ़ाते हैं, उनके करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  16. जो मनुष्य शमी के पत्र से भगवान की पूजा करते हैं, उनको महाघोर यमराज के मार्ग का भय नहीं रहता।
  17. कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी से भगवान का पूजन करते हैं, उनके 10,000 जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

कार्तिक मास में दीप दान करना ना भूलें, शुभ फल के साथ होगी हर कामना पूरी, पढ़ें ये 7 खास नियम

हिन्दू पौराणिक और प्राचीन ग्रंथों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। पुराणों में कहा है कि भगवान नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है।


धर्म शास्त्रों के अनुसार इस पूरे कार्तिक मास में व्रत व तप का विशेष महत्व बताया गया है। उसके अनुसार, जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत व तप करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है। ये 7 नियम इस प्रकार हैं -

1. नियम :

दीप दान - धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीप दान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीप दान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

2. नियम :

तुलसी पूजन - इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

3. नियम :

भूमि पर शयन - भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।

4. नियम :

तेल लगाना वर्जित - कार्तिक महीने में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल लगाना वर्जित है।

5. नियम :

दलहन (दालों) खाना निषेध - कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना चाहिए।

6. नियम :

संयम रखें - कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।

7. नियम :
ब्रह्मचर्य का पालन - कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

Tuesday, 18 October 2016

लक्ष्मी को साधने के लिए करें ये।


आज के युग में आजीविका बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारतीय वैदिक दर्शन शास्त्रों में विषम परिस्थितियों में लाभ पाने के लिये टोने-टोटके या धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा भी लिया जाता है, इनके माध्यम से ओवर ड्राफ्टिंग के माध्यम से संचित में से कुछ बेहतर प्रारब्ध पाने की चेष्टा करते है।

इसके अनेकों उदाहरण मिलते हैं जैसे कि वर्ष में मुख्य दो बार आने वाले नवरात्रों के पर्व में श्री मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित श्री दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोकों का संग्रह है और उसी में `वृत्ति` को भी देवी मानकर नमस्कार किया गया है।

इस सप्तशती में प्रथम चरित्र अध्याय-1 की देवी महाकाली जी है। 
मध्य चरित्र अध्याय दो से चार तक की देवी महालक्ष्मी जी है और उत्तम चरित्र अध्याय 5 से 13 तक की देवी महा सरस्वती जी है। अर्थात ज्ञान की देवी सरस्वती के अध्याय ज्यादा है सूचित करते है कि बुद्धि के द्वारा लक्ष्मी को प्राप्त किया जा सकता है और संसार की तामसिक प्रवृत्तियों से सुरक्षा की जा सकती है।

तभी अध्याय 5 जहां सरस्वती जी आरम्भ होती है अर्थात पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 59 से 61 तक में कहा गया है।
`या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:॥`
अर्थात जो देवी सब प्राणियों में वृत्तिरूप से स्थित है। उनको नमस्कार, उनको वारंबार नमस्कार।
वृत्ति को देवी रूप में मानकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया गया है अर्थात वृत्ति जीवन में अति महत्वपूर्ण चीज है।

इसी प्रकार इसी पुस्तक में धन की कामना पूर्ति हेतु एक विशेष सूत्र दिया गया है, वह इस प्रकार से है-
`भौमवास्यानिशमग्ने चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठते् स्त्रोतं स भवेत् सम्पदां पद्म॥`
अर्थात मंगलवार की अमावस्या की आधी रात में जब चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों। उस समय इस स्त्रोत को लिखकर जो इसका पाठ करता है वह संपत्तिशाली होता है।

इस श्लोक में मुहूर्त विज्ञान के माध्यम से ज्योतिष की ही गणना है कि जब मंगलवार को ही अमावस्या हो और शतभिषा नक्षत्र में अर्थात राहु के उस नक्षत्र में जहां सौ तारों की बात में कुंभ राशि में हो।

इसी प्रकार सूर्य दीपावली पर्व पर तुला राशि में होता है उस दिन आत्मा और मन के कारक सूर्य, चंद्रमा इकट्ठे होते हैं तो स्थिर लग्न में  श्रीवृद्धि के लिए लक्ष्मी पूजन किया जाता है। 

Friday, 18 December 2015

जैमिनी ज्योतिष

जैमिनी पद्धति के अनुसार व्यवसाय चयन हेतु कारकांश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (कारकांश आत्म कारक का नवमांश है) यदि कारकांश या उससे दसवां किसी ग्रह से युक्त न हो तो कारकांश से दशमेश की नवमांश में स्थिति से व्यवसाय ज्ञात किया जाता है।
1) कारकांश में सूर्य राजकीय सेवा देता है और राजनैतिक नेतृत्व देता है।
2) पूर्ण चंद्र व शुक्र कारकांश में लेखक व उपदेशक बनाता है।
3) कारकांश में बुध व्यापारी तथा कलाकार का योग प्रदान करता है।
4) बृहस्पति कारकांश में जातक को धार्मिक विषयों का गूढ़ विद्वान व दार्शनिक बनाता है।
5) कारकांश में शुक्र जातक को सरकारी अधिकारी शासक व लेखक बनाता है।
6) कारकांश में शनि जातक को विख्यात व्यापारी बनाता है।
7) कारकांश यदि राहु हो तो मशीन निर्माण कार्य, ठगी का कार्य करने वाला जातक को बना देता है।
8) कारकांश का केतु से संबंध हो तो जातक नीच कर्म तथा धोखाधड़ी से आजीविका कमाता है।
9) कारकांश यदि गुलिक की राशि हो और चंद्र से दृष्ट हो तो व्यक्ति अपने त्यागपूर्ण व्यवहार से और धार्मिक कार्यों से जीविका अर्जित करेगा।
10) कारकांश में यदि केतु हो और शुक्र से दृष्ट हो तो धार्मिक कार्यों से आजीविका अर्जित करेगा।
11) कारकांश यदि सूर्य व शुक्र द्वारा दृष्ट हो तो जातक राजा का कर्मचारी बनता है।
12) कारकांश से तीसरे और छठे में क्रूर ग्रह हों तो जातक खेती व बागवानी का कार्य करता है।
13) कारकांश में चंद्र हो और शुक्र से दृष्ट हो तो वह रसायन विज्ञान द्वारा आजीविका अर्जित करता है।
14) कारकांश में चंद्र यदि बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक डॉक्टर होता है।
15) कारकांश में शनि हो या उससे चौथे में हो तो जातक अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण होता है।
16) कारकांश से चौथे में सूर्य या मंगल शस्त्रों से जीविका प्रदान करता है।
17) कारकांश से पांचवें या लग्न में चंद्र व गुरु जातक को लेखनी द्वारा जीविका अर्जन प्रदान करते हैं।
18) कारकांश में पांचवें व सातवें में गुरु हो तो व्यक्ति सरकारी उच्च अधिकारी होता है।
19) कारकांश में यदि शनि हो तो जातक पैतृक व्यवसाय करता है।
20) कारकांश लग्न या उससे पंचम स्थान में अकेला केतु हो तो मनुष्य ज्योतिषी गणितज्ञ, कंप्यूटर विशेषज्ञ होता है।
21) कारकांश लग्न से पंचम में राहु हो तो जातक एक अच्छा मैकेनिक होता है।
22)यदि नवांश में राहु आत्मकारक के साथ हो तो जातक चोरी, डकैती से आजीविका चलाता है।
23) कारकांश लग्न से शनि चतुर्थ या पंचम हो तो जातक निशानेबाज होता है और यही आजीविका का साधन भी हो सकता है।
24) कारकांश से पंचम में शुक्र हो तो जातक को कविता करने का शौक होता है।
25) कारकांश से पंचम में यदि गुरु हो तो जातक वेदों और उपनिषेदों का जानकार और विद्वान होता है तथा यही जातक की आजीविका का साधन भी होता है।
26) कारकांश से पंचम में यदि सूर्य हो तो जातक दार्शनिक तथा संगीतज्ञ होता है।

रामायण का नाम वाल्मीकि जी ने राम चरित मानस क्यों रखा ?

तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की, तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा!आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है,वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?

बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो एक समय पर जाना होता है,मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.

और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.

इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"
राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal)में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical)
राम
चरित
मानस

किसी ने गोस्वामी जी से पूंछा आपने खड़े में क्यों लिखा तो गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस राम दर्शन की ,राम मिलन की सीढी है ,जिस प्रकार हम घर में कलर कराते है तो एक लकड़ी की सीढी लगाते है ,जिसे हमारे यहाँ नसेनी कहते है,जिसमे डंडे लगे होते है,गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस भी राम मिलन की सीढी है जिसके प्रथम डंडे पर पैर रखते ही श्रीराम चन्द्र जी के दर्शन होने लगते है,अर्थात यदि कोई बाल काण्ड ही पढ़ ले, तो उसे राम जी का दर्शन हो जायेगा.

Thursday, 8 May 2014

व्यक्ति भी होता हैं मोबाईल की तरह रिचार्ज

जिस प्रकार मोबाइल को निरंतर उपयोग में लेने के लिए उसे चार्ज करना जरुरी होता हैं। ठीक उसी प्रकार व्यक्ति भी अपने कार्यों को निष्पादन निरंतर करता रहें। इसके लिए उसे उर्जा की आवश्यकता होती हैं। वास्तुशास्त्र में ऐसे कई रहस्य वर्णित हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक हैं। दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम दिशा में शयनकक्ष का विधान।

आज जब वास्तु का प्रचलन बढ रहा हैं तो व्यक्तियों को वास्तु के सामान्य नियमों का ज्ञान हो चला हैं। जैसें:- किचन अग्निकोण में होना चाहिए ,शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यहाँ उनका चह मानना तो सही हैं कि किचन अग्निकोण में या शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए परन्तु

1. एक तो इस बात का कि अग्निकोण या दक्षिण दिशा उनके भुखण्ड में है भी या नही यदि हैं तो वह कहाँ हैं इसका पता उन्हें नही होता हैं। वे अपने भूखण्ड में ही समस्त दिशाएं स्थित हैं ऐसा मानते रहें हैं। जबकि वास्तव में ऐसा नही होता हैं। हमारी पृथ्वी का झुकाव 23.5 Degree का हैं। अर्थात व्यक्ति जो दिशाओ को 0 Degree  मानकर आकलन करता हैं।

2. दूसरा इन नियमों के सैधांतिक पक्ष का पता उन्हें नही होता कि अग्निकोण किचन के लिए या शयनकक्ष दक्षिण दिशा में ही क्यों? प्रतावित हैं।


चित्र-A में नवग्रहो कि दिशाएं बताई गई हैं जिसके अनुसार उर्जा कारक ग्रह मंगल दक्षिण दिशा कि स्वामी हैं। मंगल ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में सेनापती कहा गया हैं। सेनापति वह जोकि सम्पूर्ण सेना का नैतृत्व करता हैं। जो सम्पूर्ण सेना का नैतृत्व करे उसमें कितनी उर्जा होगी हम इसमा अंदाजा लगा सकतें हैं साथ ही उसकी बात सेना का प्रत्येक व्यक्ति मानता हैं अर्थात मंगल Commanding Power भी देता हैं। घर का मुखिया भी सेनापति कि तरह ही परिवार में कार्य करता हैं। परिवार कर प्रत्येक सदस्य उसका कहना मानें व समाज में उसका प्रभुत्व बढे इसके लिए उसे मंगल कि उर्जा कि आवश्यक्ता पडती हैं। 


चित्र-B के अनुसार प्रात:काल जब सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं तो सूर्य कि Solar Energy ईशानकोण से भूखण्ड में प्रवेश करती हैं जो कि सूर्य के साथ-साथ  नैऋृत्यकोण तक जाती हैं। सूर्य पश्चिम दिशा में अस्त होतें हैं अत: Solar Energy नैऋृत्यकोण तक ही रहती हैं। यह Solar Energy जिसे भूखण्ड ने दिनभर संचित किया था। वह रात भर व्यक्ति को बैटरी कि तरह चार्ज करती हैं यदि यहाँ शयनकक्ष हुआ तो अन्यथा व्यक्ति चार्ज होने से वंचित रह जाएगा।

इस Solar Energy को संचित करने कि लिए ही दक्षिण व पश्चिम दिशा में भारी निमार्ण का विधान वास्तु से संबंधित शास्त्रों में दिया गया हैं। साथ ही यह भी वर्णित हैं कि यदि इन दिशाओं में सूई की नोक के बराबर छिद्र भी हुआ तो घर में Negative Energy प्रवेश कर जाती हैं।

यहाँ ऋषीयों ने व्यक्ति को शयनकक्ष हेतू बाध्य करने के लिए Negative Energy के प्रवेश का उल्लेख किया हैं। हमारे ऋषीमुनि खगोल के ज्ञाता थें। वे जानते थे कि यदि इन दिशाओं में छिद्र हुआ तो सूर्य से प्राप्त Solar Energy संचित नही हो पाएगी वह छिद्र के माध्यम से बाहर चली जाएगी और व्यक्ति चार्ज होने से वंचित रह जाएगा।

सारांश - मंगल ग्रह की उर्जा व सूर्य की Solar Energy जो व्यक्ति ग्रहण करता हैं। दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम दिशा में शयनकक्ष बनवाकर। वह व्यक्ति निरंतर उन्नति को प्राप्त करता हैं। परिवार के लोगों में तालमेंल, समाज में अपनी प्रतिष्ठा, प्रभूत्व या कार्यक्षेत्र में विकास करने में समर्थ रहता हैं।

Monday, 21 April 2014

कौन बनेगा भारत का प्रधानमंत्री ?

आज देश में जब लोकसभा के चुनाव हो रहें हैं तो लोगो कि नजर यह देखने में लगी हैं कि इस बार कौन होगा भारत का प्रधानमंत्री। अटकले लगाने का बाजार गर्म हैं।
            यदि हम पार्टियो कि बात करें तो प्रत्येक पार्टी अपने अपने नेता के जितने कि बात कर रही हैं। सभी नैताओ कि पास अलग-अलग किन्तु मजबुत मुद्दें हैं। यदि हम आप पार्टी कि बात करे तो ऐसा नेता मिलता हैं जिसने कुर्सी कि परवाह किये बिना लोगो कि बारे में ही सोचा। यहाँ यह भी माना जा रहा हैं कि आप के मुख्य नेता अरविन्द केजरीवाल शायद अपने किये गए वादो को पूरा करने में स्वयं ही असमर्थ थे सो उन्होनें अपने पद से स्तीफा दे दिया। वास्तविक्ता का जबकि पता ही नही हैं किसी को कि क्या सही हैं। किन्तु ये तो माना ही होगा कि उन्होने हो मुद्दे उठाए वह आम आदमी के हित के लिए ही थे।
            ठीक दूसरी तरफ काग्रेंस ने जो विकास पिछलें 10 वर्षों में देश में किये उन्हे भी नजर अंदाज नही किया जा सकता हैं मैट्रों, फ्लाईओवर, एयरपोर्ट, मोबाइल में 2जी, 3जी और अब 4जी सराहनीय कार्य रहें हैं। किन्तु साथ ही कई ऐसे भी कार्य रहें जो अत्यंत दु:खदायी रहैं। खैर overall इनके पास भी दमदार मुद्दा हैं प्रधानमंत्री बनने का।
            अब हम बात करतें हैं बीजेपी की पिछले विधानसभा चुनाव में दमदार जीत हासिल करने वाली पार्टी बीजेपी ने भी सदैव विपक्ष में रहकर अहम भुमिका निभाई हैं। आजादी के बाद बहुत कम ही अवासर इस पार्टी को देश की कमान संभलने का मिला। वर्तमान में बीजेपी के मुख्य नेता नरेन्द्र मोदी जिन्होनें गुजरात का नाम देश में ही नही विदेशो में भी फैलाया हैं। अब वे उसी विकास को सम्पूर्ण भारत में भी करना चाहते हैं। कई आलोचनात्मक कार्य भी गुजरात में इनके शासन काल में रहें हैं। अटकलो के बाजार में नरेन्द्र मोदी को लगभग देश का प्रधानमंत्री मान भी लिया गया हैं। मिडिया भी इस बात को हवा दे रही हैं। सभी विपक्ष की पार्टी को इस बात का एहसास भी शायद हैं।
आइये हम जाने कि ज्योतिष गणना के अनुसान भारत के प्रधानमंत्री बनने कि उम्मीद किस नेता कि ज्यादा हैं।
1. अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी)- केजरीवाल कि पत्रिका वृषभ लग्न कि हैं। चंद्रलग्न भी वृषभ ही हैं।
Arvind Kejriwal Horoscope
वृषभ राशि वाले व्यक्ति सदैव लोगो का भला करते हुए पाए जातें हैं। अपने बुते से बाहर जाकर कार्य करना कई बार उन्हे नुकसान दे जाता हैं। केजरीवाल की पत्रिका में शनि वक्री होकर द्वादश भी में नीच राशि में होकर स्थित हैं। शनि का नीचभंग भी नही हो रहा हैं। 7 नवम्बर से गोचर के वक्री गुरु ने इन्हे दिल्ली विधानसभा में जीत दिलवाई। 28 दिसम्बर 2013 से 14 फरवरी 2014 तक ये दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। वक्री गुरु मे ही पद का त्याग भी कर दिया। यदि वर्षकुण्डली का अध्ययन करे तो वर्षेश सूर्य हैं और मुथा कुभं की हैं जिसके स्वामी शनि हैं। मुंथा भाव पंचम हैं। मंगल भी नीच के  Natal horoscope में स्थित हैं। पत्रिका का दशम भाव जहाँ रोजगार से संबंधित होता हैं वही सम्मान प्राप्ति व अप्राप्ति को भी दर्शाता हैं। नवम व दशमभाव के स्वामी ग्रह शनि की द्वादश भाव में वक्री होकर स्थित हैं। गोचर में भी चल रहें वक्री शनि अब सम्मान को क्षति पहुचाने लगेगें। जिस प्राकार अरविंद केजरीवाल का नाम चढा था उसी प्रकार अब उतरने भी लगेगा।
            दिसम्बर 2013 में जहॉ आप पार्टी को लोग एक शसक्त पार्टी मानने लगें थे अब वे ही नकारने लगेंगें। मुख्यमंत्री पद के हिसाब से इन दिनो इनकी पत्रिका कमजोर हो चली हैं। सप्तमेंश मंगल जो कि गोचर में 2 मार्च से वक्री चल रहें हैं। वे अपने ही दल के लोगो में अलगाव को बढाऐगें। परिणाम हम इन दिनो देख ही रहें हैं।

2. राहुल गाँधी (कांग्रेस पार्टी)-  राहुल गाँधी की पत्रिका मकर लग्न की हैं तथा इनकी राशि वृश्चिक हैं। वृश्चिक में
Rahul Gandhi Horoscope
स्थित चंद्रमा नीच के होतें हैं। चन्द्रमॉ का नीचभंग भी नही हो रहा हैं साथ ही चतुर्थ भाव में शनि भी अपनी नीच राशि मेंष में होकर स्थित हैं। किन्तु यहाँ शनि का नीचभंग हो रहा हैं। इस समय इनकी पत्रिका में चंद्रका में मंगल की दशा चल रही हैं। दोनो ही ग्रह (चंद्रमा व मंगल) पत्रिका में एक दूसरे से छठे व आठवे होकर स्थित हैं। अत: यह दशा षडाष्टक ग्रहों कि दशा कहलाती हैं। षडाष्टक ग्रह की दशा शुभ परिणाम नही देती हैं साथ ही शनि भी इस समय गोचर में इनकी राशि वृश्चिक से द्वादश भाव में चल रहे हैं हो कि साढेसाती के रुप में पीडित कर रहें हैं। मंगल जो कि एक उर्जात्मक ग्रह हैं वे इनकी पत्रिका में अस्त भी हैं। अस्त ग्रह कि दशा शुभ परिणाम देने में असमर्थ होती हैं। यहॉ हम ऐसे व्यक्ति कि कल्पना कर समते हैं हो देना तो कुछ चाहतें हैं किन्तु स्वयं के जले शरीर के कारण स्वयं ही पीडित हैं। ज्योतिष में एक नियम हैं कि यदि कोई ग्रह जब अस्त् होता हैं तो उस ग्रह के शुभ-अशुभ परिणाम सुर्य देते हैं। क्योकि ग्रह सूर्य के सानिद्धय में ही अस्त होते हैं। यहाँ यदि हम सूर्य से शुभ परिणाम प्राप्ति कि बात करें तो सूर्य भी 3.33 अंश पर स्थित हैं। जो कि लगभग राशिसंधि के पास हैं। अत: सूर्य इनके लिए favorable रुप से कार्य करने में असमर्थ हैं। गुरु भी जून तक मिथुन राशि में ही रहेगें जो कि इनकी चंद्रकुण्डली से अष्टम भाव में स्थित हैं। अत: गुरु भी शुभ फल प्रदान करने में असमर्थ से प्रतित हो रहें हैं।
            अब हम इनकी वर्ष कुण्डली का अध्ययन भी कर लेते हैं। 18 जुन 2013 को निर्मित वर्षकुण्डली मकर लग्न की हैं। इसमें वर्षेश शनि व मुथां सिंह कि हैं जो कि अष्टम भाव में स्थित हैं। अर्थात मुथां भाव अष्टम हैं। वर्षेश शनि कार्यो में सफलता धीरे-धीरे प्रदान करेगें। इस वर्ष शनि के प्रभाव से व्यक्ति किसी पर भी पूर्णरुप से विश्वास नही करे पाऐगें। शनि कि प्रभाव के कारण योजनाए बनाने में व्यवहारिक व दर्शानिक दृष्टिकोण तो अपनाते हैं किन्तु सफलता का स्तर घटता रहता हैं। जिसका आभास व्यक्ति को होने भी लगता हैं।
अष्टम भाव की मुथां इस वर्ष पद, स्वास्थ्य,सम्मान, पारिवारिक रिश्तो व प्रतिष्ठा आदि विषयों से हानि प्रदान कर सकती हैं। इस समय व्यक्ति को अत्यधिक संधर्ष अपने आप को व अपके पक्ष को बनाएं रखने के लिा करने पडते हैं। सफलता प्राप्त न होने पर धार्मिक प्रवृति का त्याग तक करने कि सोचने लगता हैं। ऐसा यदि करता हैं तो आगे चलकर ओर भी नुकसान दायक रहता हैं। अष्टम भाव की मुंथा व वर्षेश शनि होने पर धर्म-कर्म में समय देना हितकर रहता हैं। Overall  प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रुप में यह पत्रिका भी दमदार प्रतीत नही हो रही हैं।

3. नरेन्द्र मोदी (भाजपा पार्टी)-  तुला लग्न की जन्मपत्रिका नरेन्द्र मोदी की हैं। मंगल लग्न में ही विराजमान हैं। बुध
Narendra Modi Horoscope
उच्च के वक्री होकर द्वादश भाव में स्थित हैं। चन्द्र राशि मिथुन हैं। इनकी जन्म पत्रिका में लग्र के स्थित मंगल इन्हे उर्जावान व अविश्वनिय निर्णय लेने वाला बनातें हैं। लग्न में स्थित मंगल व्यक्ति को साहसी, आत्मविश्वासी व उच्चकोटि का कार्य करने मे सक्षम बनाते हैं। मंगल के प्रभाव में व्यक्ति selfdisicion लेने वाला होता हैं जिसके  कई बार खामियाजा भी अठाना पडता हैं।
ज्योतिष जगत में शुक्र व मंगल के combination के प्रभाव वाले व्यक्ति अपने कार्यो को कलात्मक तरीके से स्पष्टता पूर्वक करता हैं। जिसकी छाप लोगो के दिलो पर लम्बे समय तक बनी रहती हैं। नरेन्द्र मोदी कि जन्मपत्रिका में लग्न मे ंमंगल तुला राशि में स्थित हैं जिसपर शनि सूर्य युक्त शुक्र कि दृष्टि द्वारा व नावांश कुण्डली में शुक्र व मंगल एक दूसरे के नावांश में स्थित होकर शुक्र व मंगल के संयुक्त गुणों का प्रभाव इनपर दर्शा रहे हैं। इनकी जन्म पत्रिका में दशम भाव के स्वामी चंद्रमा नवम भाव में स्थित हैं हो कि एक राजयोग हैं साथ ही अस समय लग्नेश शुक्र में दशमेंश चंद्रमा की दशा भी चल रही हैं। गुरु भी इस समय पत्रिका के नवम भाव व चंद्रराशि से गोचर कर रहें हैं। जो कि इनमें आत्मविश्वास व कार्यो में सफलता को दर्शा रहे हैं। इन दिनो जो मोदी कि लहर कहा जा रही हैं वह शुक्र-चंद्र कि दशा व गुरु की देन हैं। 16 जुन 2013 से 14 फरवरी 2015 तक यह दशा रहेगी जो इनके प्रधानमंत्री होने का पुखता प्रमाण दे रही हैं।
            अब हम इनकी वर्ष कुण्डली पर भी एक नजर डाल लेते हैं कि क्या वर्ष कुण्डली भी इनके प्रधानमंत्री होने का प्रमाण दे रही हैं या नही?
अक्टुबर 2001 में जब से गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय इनकी वर्ष कुण्डली में वर्षेश सूर्य व मुंथा मकर राशि कि थी। इस वर्ष भी सितम्बर 2013 में निर्मित इनकी वर्ष कुण्डली में वर्षेश सूर्य व मुंथा मकर की ही हैं। अर्थात वर्ष कुण्डली भी प्रधानमंत्री पद का प्रमाण दे रही हैं।
इतने शुभ योगो के बाद भी एक बात ध्यान देने वाली हैं कि इनकी पत्रिका में राजयोगकारक चंद्रमा केन्द्रुम योग का  निर्माण कर रहे हैं। ज्योतिष में राजयोग भंगध्याय में लिखा है कि यदि चंद्रमा षडबल में कमजोर हो, अस्त , नीचराशि, शत्रुक्षेत्री, केन्द्रुम योग में व कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथी के पश्चात व शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथी के पूर्व का चंद्रमा (पक्षबल हीन) हो तो समस्त राजयोग भंग हो जाते हैं।


तीनो पत्रिकाओ का निष्कर्ष - प्रधानमंत्री पद पर तो नरेंद्र मोदी ही होगें किन्तु पूर्णबहुमत से सरकार बनाने में संदेह हैं।

Monday, 24 February 2014

गौमुखी व सिंहमुखी भूखण्ड की भ्रांतियाँ

एक बार एक सज्जन से कुछ लोगो को मेंने कहते हुए सुना की निवास हेतु गोमुखी व व्यापार हेतु सिंहमुखी भूखण्ड शुभ होते हैं। उन दिनो में वास्तु कि प्रेक्टिस किया करता था। कोतुहलवश मेने उन लोगो से इसका कारण पुछा तो उन्होंने बताया कि गोमुखी भुखण्ड का आगें का भाग पीछे कि तुलना मे छोटा होता हैं। चित्र ए के अनुसार फलत: घर खर्च मे कमी आती हैं साथ ही यहाँ निवास करने वाला व्यक्ति मितव्ययी नही होता हैं। सिंहमुखी भुखण्ड में आगें का भाग पीछे की तुलना में बडा होता हैं। चित्र बी के अनुसार फलत: व्यापार करने पर लोगो की आवक बनी रहती हैं। लाभ बढता हैं।

                         
यह बात मेंरी समझ में नही आई कि जब ओर तो गोमुखी भुखण्ड में रहने पर खर्चे घटते हैं वही इसके विपरीत सिंहमुखी भुखण्ड में निवास करने वाले व्यक्ति को तो मितव्ययी होना चाहिये। परिणाम स्वरूप लाभ कि जगह हानि होनी चाहिए।

हम सभी जानते हैं कि वास्तुपूरुष कि कल्पना वर्गाकार रूप में कि जाती हैं। साथ ही सम्पूर्ण भूखण्ड में इनकी सत्ता व्याप्त होती हैं। यही कारण भी हैं कि भूखण्डो के आकार में शुभता की श्रेणी में पहला स्थान वर्गाकार भुखण्ड का ही हैं (वर्गाकार  भुखण्ड शुभ होते हैं या नही आज के परिपेक्ष में इसकी चर्चा हम अगले किसी भाग में करेंगें)

                            
चित्र ए1 अनुसार गोमुखी भुखण्ड या चित्र बी1 के अनुसार सिहंमुखी भूखण्ड में हम जब वास्तुपूरुष की कल्पना करेगें तो किन्ही दो कोणो का कटान व दो कोणो का विस्तार देखने को मिलेगा। भूखण्ड के किसी भी कोण का विस्तार व कटान हानि व कष्टो को बढाने वाला होता हैं। केवल ईशान कोण का विस्तार व भी अपेक्षित मात्रा में लाभ को बढाने वाला होता हैं।
                           
मान लिजिए कि कोई उत्तरमुखी गोमुखी भूखण्ड हैं। इस स्थिती में चित्र ए1 के अनुसार भूखण्ड का वायव्य कोण व ईशान कोण कट जाऐगें व साथ ही नैऋ त्य कोण व अग्रिकोण बढ जाऐगें। 

ईशान कोण में वास्तुपुरुष का सिर होता हैं। यदि भुखण्ड में वास्तुपुरुष का सिर ही नही होगा तों वहाँ निवास करने वाले व्यक्ति कभी भी सफलता अर्जित नही  कर पाऐगें। कभी किसी भी बात पर एक मत नही होगें। पुत्र पिता से व पत्नी अपने पति की बातो का विरोध करते हुए मिलेगें। गृहस्वामी हमेशा इस बात से पीडित रहेगा की कोइ्र्र उसकी बात नही मानते हैं। अनिर्णय, प्रसिद्धी का नाश, गृहस्वामी की संतान का अलग से घर बसा लेना की प्रवृति धीरे-धीरे घर को पतन की ओर ले जाती हैं। अग्रिकोण का विस्तार भी हानि देता हैं। अल्पपुत्रता, डिहाईड्रेशन, किडनी फेल व औद्योगिक पतन आदि। बढी हुई अग्रि की तीव्रता वहा निवास करने वाले व्यक्ति के स्वभाव में देखने को मिलती हैं। जो एक दिन पतन का कारण बनती हैं।

ठीक दूसरी तरफ वायव्यकोण का कटान हो रहा हैं। वायव्यकोण के देवता राहु  व वायव्यकोण से ठीक पश्चिम दिशा मध्य के बीच का चंद्रमा का स्थान हैं। साथ ही वायव्यकोण में रोग नाम के देवता का स्थान हैं। फलत: पागलपन, डिप्रेशन, दूषित विचारधारा, वायुजनित रोग, संक्रमण आदि परिणाम धीरे-धीरे गृहस्वामी या वहाँ निवास कर रहें लोगो को सताने लगती हैं।

नैऋत्यकोण का विस्तार भी हो रहा हैं इस भूखण्ड में हो रहा हैं। नैऋत्यकोण का विस्तार यदि पश्चिम दिशा से हो रहो हो तो कानूनी विवाद, दुर्घटनाएं, संतान का किसी भी क्षेत्र में सफल न होना, संस्था में वित्तिय घाटा आदि परिणाम प्राप्त होतें हैं। कोई भी संस्था यदि ऐसे भूखण्ड पर चल सफलता पूर्वक चल रही हो तो भी यह समझना चाहिये कि अगले कुछ वर्षो में उस संस्था का पतन निश्चित हैं।

अत: सिंहमुखी व गोमुखी दोनो ही प्रकार के भूखण्ड वास्तु के दृष्टिकोण से शुभ नही होतें हैं।

Sunday, 9 February 2014

विभिन्न राशियों पर कुंभ के सूर्य का प्रभाव

13 फरवरी, 2014

ज्योतिष जगत में सूर्य को आत्मा, राजा, सत्ताधारी, सरकार, ख्याति, शोर्य, प्रतिष्ठा आदि विषयों से संबंधित ग्रह माना जाता हैं। किसी व्यक्ति विशेष की पत्रिका में जब अन्य ग्रहों के साथ-साथ सूर्य उच्च, मित्र या स्वराशिगत हो तो और षडबल में भी बलवान हो तो व्यक्ति को सरकारी सेवा का अवसर प्राप्त होने का अवसर प्राप्त होता हैं यदि ऐसा नही तो स्वयं का व्यवसाय अवस्य करता हुआ मिलेगा। यदि प्राइवेट  नौकरी करनी भी पडे तो ज्यादा समय तक नही करेगा। यदि सुर्य नीच राशि में स्थित हो तो भी व्यक्ति छोटे या बडे स्तर की संस्था में प्रबंध का कार्य करता हुआ मिलेगा। इस मामले में  मामले में मेष व तुला लग्न वालो को वैवाहिक सुख की प्राप्ति नही होती हैं यदि हो तो जल्द ही अलग होने की स्थिती बनने लगती हैं।

ऐसे विद्यार्थी जिनके सूर्य बलवान हो वे एक या दो प्रतियोगी परिक्षओ  में ही सफलता हासिल कर सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेते हैं। जबकि कमजोर सूर्य वाल निरंतर प्रयास के बाद भी सफलता से वंचित ही रहते हैं। पत्रिका में स्थित सूर्य के परिणाम कब प्राप्त होगें इसकी पुष्टि ग्रहों की महादशा के साथ-साथ गोचर भी अदा करता हैं। सूर्य का राशि परिवर्तन मकर से तुला में 13 फरवरी को प्रात: 2 बजकर 13 मिनट पर हो रहा हैं। 14 मार्च तक सूर्य इसी राशि में स्थित रहेंगे। कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं। शनि को ज्योतिष में भृत, दास, सेवक व न्यायधीश के रूप में जाना जाता हैं। अर्थात राजा (सूर्य) सेवक (शनि) के घर जा रहें हैं। सूर्य के गोचर की यह स्थिती  राजनैतिक उथल पुथल का होना दर्शाती हैं। साथ ही 18 फरवरी को बुध भी वक्री होकर शनि की दूसरी राशि मकर में प्रवेश करेंगें। बुध ग्रह वाणी के कारक हैं जो रानेताओं में तरह तरह की टिप्पणियों मे बढोत्तरी करेगें। इस दौरान सत्ता में अविश्वनीय घटनाक्रम देखने को मिलेगा। जिसे मीडिया भुनाता हुआ दिखाई देगा। सत्तारूढ दलो में टकराव के प्रबल योग हैं। 

आइये जाने प्रत्येक राशि पर सूर्य के गोचर का क्या प्रभाव पडेगा।

1. मेष- मेष राशि से सूर्य लाभ भाव में गोचर करेगें। आपकी महत्वपूर्ण महत्वकांक्षाए पूर्णता की और बढती दिखाई देगी। अनुबंधो और समझौतो में उत्तराद्र्ध गोचर से लाभ प्राप्त होगा। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आएगी। प्रेम प्रसंगो से संबंधित मामलो में बढोत्तरी हीगी।

2. वृष- अपाकी राशि से सूर्य का गोचर दशम भाव से हो रहा हैं। पत्रिका का दशम भाव आजिवीका से संबंधित होता हैं। अत: व्यापार से लाभ की मात्रा बढेगी। यदि आप सेवारत हैं तो पद-प्रतिष्ठा बढ सकती हैं। अधिकरी वर्ग आपके किये गए कार्यों से खुश रहेगें। अपने व्यवसाय को बढाने या नवीन व्यापार हेतु धन की पूर्ति ऋण के रूप में प्राप्त होगी। किसी पुराने मित्र या रिश्तेदार से मुलाकात हो सकती हैं।

3. मिथुन- सूर्यदेव आपकी राशि से नवम भाव यानी भाग्य भाव से गोचर करेगें। इस गोचर से माता-पिता को स्वास्थय संबंधी समस्या हो सकती हैं। अधिकारी वर्ग से संबंधित लोगो से मेलजोल लाभप्रद रहेगा। किसी धार्मिक स्थल की यात्रा के योग भी बन सकते हैं। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आएगी। पूर्वाद्ध की अपेक्षा उत्तराद्र्ध लाभप्रद रहेगा।
4. कर्क- कर्क राशि से सूर्य का गोचर अष्टम भाव में हो रहा हैं। व्यवसाय में अचानक नुकसान या सकस्या शुरू हो सकती हैं। यदि आप नोकरी करते है तो अधिकारी वर्ग आपके कार्यो से नाखुश रहेगें। यदि आपका प्रमोशन इस दौरान होना है तो निराशा होना पड सकता हैं। भूमि-भवन संबंधित मामलो के गति आएगी। अपने व्यवसाय को बढाने या नवीन व्यापार हेतु धन की पूर्ति ऋण के रूप में प्राप्त होगी। आपकी राशि को शनि पहले ही ढैया लगाकर पीडित कर रहें है। किसी नवीन योजना का क्रियांवयन नवम्बर तक टाले अन्यथा हानि उठानी पड सकती हैं।

5. सिंह- सुर्य आपकी राशि से सप्तम भाव से गोचर करेगें। साझेदारी व्यापार में मतभेद हो सकता हैं। आपका विश्वास साझेदार से उठने लगेंगा। जिसके कारण हानि भी हो सकती हैं। जिवनसाभी से भी मतभेद बढ सकता हैं। घरेलू समस्याओं का हल शांतिपूर्वक निकालें। इस माह जन्म लेने वाले शिशुओं में बालिका की अपेक्षा बालको की संख्या अधिक होगी।

6. कन्या- सूर्य का यह गोचर आपके लिए लाभप्रद रहेगा। कोई लम्बा विवाद जो अदालत या अन्यत्र चल रहा हैं  वह अब अपने पक्ष में होता हुआ दिखाई देगा। एक और जहां शनि की साढेसाती आपकी पैरो पर हैं वही सूर्य राशि से षष्ठम भाव में होगें जो शत्रुओ की पराजय का परिचायक हैं। अर्थ लाभ की प्राप्ति हो सकती हैं। वाहन सावधानी से चलाए दुर्घटना हो सकती हैं।

7. तुला- आपकी राशि तुला से सूर्य गोचरवश पंचम भाव में आऐगें। सूर्य का यह गोचर संतान के कष्ट को दर्शाता हैं। यदि आप नौकरी करते है तो कार्यभार तो बढेगा किन्तु पद नही। यदि आप व्यावसाय करते हैं तो हानि हो सकती हैं। यात्रा में कष्ट हो सकता हैं अत: यात्रा से बचे। प्रेम संबंधो के लिए समय अभी अनुकूल नही हैं।

8. वृश्चिक- आपकी राशि से सूर्य चतुर्थ भाव से गोचर करेगें। पत्रिका का चतुर्थ भाव माता, भूमि-भवन, सुख सुविधओ से संबंधित होता हैं। अत: उपरोक्त मामलो से कष्ट प्राप्त हो सकता हैं। माता को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती हैं। रियलस्टेट में किया गया निवेश हानि दे सकता हैं।

9. धनु- आपकी राशि से सूर्य तृतीय भाव से गोचर करेंगें। तृतीय भाव पराक्रम, Self Confidence  छोटे भाई-बहनों से संबंधित होता हैं। सूर्य के इस गोचर से आप कोई दुस्साहस पूर्ण निर्णय ले सकते हैं जो आगें जाकर हानिकारक हो सकता हैं। भाइयों से सहयोग की आशा करना व्यर्थ हैं। गोचर का उत्तराद्र्ध कार्य के हिसाब से ठीक रहेगा।

10. मकर- सूर्य आपकी राशि मकर से द्वितीय भाव से गोचर करेगें। द्वितीय भाव वाणि, धन, कुटुम्ब से संबंधित होता हैं। सूर्य अग्नितत्व ग्रह हैं जो वायुतत्व राशि मकर में स्थित हैं। आपकी वाणी लागो पर अग्नि के समान प्रहार वाली होगी। अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें अन्यथा भारी नुकसान उठाना पड सकता हैं। कार्यस्थल पर आपके द्वारा किये गए कार्यों की प्रशंसा होगी। Real Estate से संबंधित विषयो से लाभ हो सकता हैं।

11. कुंभ- सूर्य का आपकी राशि कुंभ से गोचर मांसिक तनाव को बढावा देने वाला होगा। कार्यस्थल पर कार्यभार तो बढेगा किन्तु पद नही, परिणामस्वरूप मांसिक अवसाद हो सकता हैं। गोचर के उत्तराद्र्ध मे पद भी बढ सकता हैं। अविवाहितो के विवाह संबंधी मामलो में गति आऐगी। वैवाहिक जिवन में अब मधुरता आने लगेंगी।

12. मीन- प्रत्येक भाव से द्वादश भाव उस भाव का नुकसान करता हैं। आपकी राशि मीन से सूर्य द्वादश भाव से गोचर करेगें। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती हैं। सूर्य का यह गोचर आपके लिए चिंताओ भरा होगा। एक और जहा अर्थ प्रबन्ध की समस्या हो सकती हैं। वही कार्यस्थल पर भी समस्यां उत्पन्न होने लगेगी। यदि आप व्यवसाय करतें हैं तो नवीन आडॅर प्राप्त नही होगें। अधिकारी वर्ग थोडे नाराज से हो चलेगें। कोर्ट कचहरी से संबंधित विषयो में निराशा हाथ लगेंगी। भाग्य भी साथ छोडता हुआ सा महसूस होगा। परन्तु चिंता न करें गोचर का उत्तराद्र्ध लाभप्रद रहेगा। अविवाहितो के संबंध तय होगें।